हिंदू संहिता : जारी - Page 205

190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय उपाध्यक्ष : इसका अर्थ यह नहीं है कि माननीय सदस्य दीर्घसूत्री हो सकते हैं।

श्री जे. आर. कपूर : यदि मेरे माननीय मित्र के सुझावों को इसके तार्किक निष्कर्ष पर ले जाया जाए तो हम पर भी कह सकते हैं कि एक माननीय सदस्य के नाम के सभी संशोधन रख दिए गए हैं।

माननीय उपाध्यक्ष : हमें उसे तूल देने की जरूरत नहीं है।

श्री जे. आर. कपूर : प्रस्ताव है कि खंड 2 के उपखंड (3), के स्थान परः

‘‘(3) इस संहिता में ‘हिन्दु’ अभिव्यक्ति जहां कहीं भी है उसका अर्थ यह होगा कि कोई व्यक्ति यद्यपि कि धर्म से हिंदू नहीं है, तथापि इस संहिता के प्रावधानों द्वारा शासित होता है या इस संबंध में केन्द्र सरकार के द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से अपनी सहमति की घोषणा करता है कि वह एतद्द्वारा शासित होगा। इसमें शामिल होगा।’’

तत्पश्चात् मैं सूची 5 की संशोधन संख्या 272 पर आता हूँ।

माननीय उपाध्यक्ष : मैं सोचता हूँ कि हमें एक के बाद एक उप-खंड पर विचार करना चाहिए। खंड 2 में बहुत से उप-खंड हैं। जब तक इन उप-खंडों में से किसी एक के अंतर्गत संशोधन नहीं लाया जा सकता है तब तक हम उप-खंड (1) पर विचार करेंगे। तत्पश्चात् हम दूसरे उप-खंडों पर विचार करेंगे। इस सुझाव पर माननीय मंत्री जी का क्या सुझाव है?

डॉ. अम्बेडकर : मैं इस पर पूरी तरह से सहमत हूँ।

श्री जे. आर. कपूर : क्या मैं कह सकता हूँ कि सभी संशोधनों को एक ही साथ रख देने की अनुमति दी जा सकती थी। हम कल से संविधान सभा में अपनाए गए प्रक्रिया का पालन करेंगे।

माननीय उपाध्यक्ष : आज मैं माननीय सदस्यों पर यह छोड़ता हूँ कि वे अपनी इच्छा से जो भी चाहें संशोधन रखें। कल मैं उनका प्रत्येक उप-खंड के अंतर्गत समेकन कर दूँगा।

श्री जे. आर. कपूर : मैं यह प्रस्ताव रखता हूँ :-

( vi ) माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा, प्रस्तावित संशोधन, संख्या 3 भाग (2) के स्थान पर :-

‘‘(2) उप-खंड (4) के लिए निम्नलिखित प्रतिस्थापित होगा, अर्थात :-