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मुस्लिम धर्म में करने की स्वतंत्र नहीं होगा। मेरे संशोधन के और भी कई निहितार्थ हैं किंतु मैंने सिर्फ इसी एक निहितार्थ को स्पष्ट किया है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : एक पत्नी ही पर्याप्त रूप से मुश्किल पैदा करती होगी, दो पत्नियों का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
माननीय उपाध्यक्ष : आज मैं खंड 2 के सभी मूल खंड और माननीय मंत्री जी के संशोधनों में संशोधन रखने की अनुमति दूँगा मैं कल उन्हें एक साथ रखने का प्रयास करूँगा।
पंडित ठाकुरदास भार्गव (पंजाब) : क्या मैं जान सकता हूँ कि मेरे माननीय मित्र ने अभी-अभी जो संशोधन रखे हैं उनमें से कोई फरवरी सत्र में भी रखे गये थे? मैं समझता हूँ कि अभी रखे गए संशोधनों में से एक पर सदन में चर्चा हुई थी - संशोधन उस व्यक्ति से संबंधित था जो यह घोषणा करता है कि संहिता उस पर बाध्यकारी होगी। मैं समझता हूँ कि उन्होंने भी उस पर वक्तव्य दिया था। मैं नहीं जानता कि वह संशोधन पहले ही रखा जा चुका है तथा उस पर वक्तव्य भी दिया जा चुका है।
श्री जे. आर. कपूर : मैं अपने माननीय मित्र को आश्वस्त कर सकता हूँ कि मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि मैं अपने पहले के किसी भी संशोधन की पुनरावृत्ति न करूँ। निःसंदेह इन संशोधनों में से कुछ भी विषय-वस्तु मेरे द्वारा रखी गई पहले की संशोधनों में इस रूप में या दूसरे रूप में शामिल थी। लेकिन जब मैंने यह देखा कि कोई खास संशोधन प्रयोजन के उपयुक्त नहीं होगा, और मेरे माननीय मित्र पंडित ठाकुरदास भार्गव द्वारा उस समय उठाई गई आपत्ति से निपटने के लिए मैंने अपने पहले के संशोधनों में दिए संशोधन किया है जिससे कि उसे संहिता की परिसीमा में बिल्कुल ठीक से रखा जा सके और इसे अन्यथा भी स्वीकार्य बनाया जा सके। श्री श्यामनंदन सहाय : प्रस्ताव है कि -
खंड 2 में निम्नलिखित परंतुक जोडि़ए :-
‘‘तथापि प्रावधान है, इस धारा में किसी भी चीज के होने पर भी यह संहिता किसी भी व्यक्ति पर लागू नहीं होगी। जब तक कि वह व्यक्ति किसी वैसे प्राधिकारी और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इस संहिता के द्वारा शासित होने की अपनी इच्छा को प्रकट करते हुए अपना नाम पंजीकृत नहीं करा लेता है।’’
सरदार बी. एस. मान (पंजाब) : मैं प्रस्ताव रखता हूँ :-