हिंदू संहिता : जारी - Page 210

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माननीय उपाध्यक्ष : मेरा प्रस्ताव इस तरह से करने का है। यदि कोई एक सदस्य जो पहले ही अपने संशोधन रख चुका है उनकी ओर ध्यान दिलाना चाहता है। वह उन संशोधनों की ओर संकेत कर सकता है। मैं एक नोट बनाऊँ, कार्यालय के पास भी नोट हैं। जिससे कि समय आने पर मैं उन्हें रख सकूँगा। जिन पर पहले ही वक्तव्य दिए जा चुके हैं, मैं ध्यान रखूँगा कि उन्हें नहीं दोहराया जाए। मैं यही कह सकता हूँ।

श्री कामथ : लेकिन उन संशोधनों पर बहस अवरुद्ध नहीं है। क्या इसका अर्थ यह है कि वे सभी संशोधन निपटाए जा चुके हैं?

माननीय अध्यक्ष : नहीं! सभी संशोधन विचाराधीन हैं। किसी भी संशोधन को नहीं निपटाया गया है।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : कुछ हद तक पुनरावृत्ति अनिवार्य है क्योंकि सभा इस बीच सब कुछ भूल चुकी है।

माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य जानते हैं कि पुनरावृत्ति होने पर भी मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ। अतएव, मैं अपने आपको सुझाव देता हूँ कि मैं कुछ और सचेत रहूँगा। डॉ. टेक चन्द (पंजाब) : प्रस्ताव है कि :-

खंड 2 के उपखंड (1) का भाग (क) ‘‘सदस्यों’’ के लिए ‘‘अनुयायियों’’ प्रतिस्थापित करें।

यह केवल एक औपचारिक संशोधन है और डॉ. अम्बेडकर ने इसे स्वीकार करने पर सहमति दे दी है। तत्पश्चात् इस खंड को इस तरह से पढ़ा जाएगा ‘‘ब्रह्म, प्रार्थना या आर्य समाज के अनुयायियों।’’

श्री भट्ट (बम्बई) : मैं प्रस्ताव रखता हूँ :-

खंड 2 के उपखंड (2) के स्थान पर :-

‘‘(2) यह संहिता किसी भी व्यक्ति पर, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, जो हिंदू विधि द्वारा या उस विधि के अंग के रूप में किसी प्रचलित प्रथा द्वारा शासित हो चुका हो, इसमें उल्लिखित किसी भी विषय के मामले में लागू होगा।’’

मैंने कोई अलग संशोधन नहीं रखा है। किन्तु डॉ. अम्बेडकर ने ‘जनजाति’ शब्द को ‘समुदाय’ के साथ प्रयोग किया है, क्या वह इनके साथ ‘गोत्र’ शब्द भी नहीं रखेंगे?