198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक व्यक्ति धर्म परिवर्तित करना चाहता है तो उसके मूल धर्म के अंतर्गत उसके अधिकारों और दायित्वों को प्रभावित नहीं होना चाहिए।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : यदि वह गलत हैं तो मैं भी उतना ही गलत हूँ। हम एक दुश्चक्र में हैं। जो कि धर्मान्तरण के मूल्य विचार के विपरीत जाता है। यदि एक व्यक्ति धर्मान्तरण कहता है तो उसका अतीत से संबंध विच्छेद हो जाता है तथा एक नए अध्याय की शुरूआत करता है। चूँकि श्री कपूर ने अपना संशोधन पेश किया है, मैं यह संशोधन पेश कर रहा हूँ। दोनों को ही स्वीकार किया जाना चिहए या दोनों को ही अस्वीकार कर दिया जाना है।
माननीय उपाध्यक्ष : दोनों ही माननीय सदस्य धर्मान्तरण के परिणामस्वरूप अपने वैध या नागरिक अधिकारों में किसी भी परिवर्तन से बचना चाहते हैं। धर्मान्तरण से संपत्ति, उत्तराधिकार इत्यादि के मामले में उनके अधिकारों और दायित्वों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : एक पुराना अधिनियम है जो ईसाई धर्म में धर्मान्तरण करने वाले हिंदुओं के पुराने अधिकारों को बचाता है।
( viii ) तत्पश्चात् प्रस्ताव है कि खंड 2 के उप-खंड (1) के बाद, जोडि़ए :-
‘‘(1क) यह संहिता अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगी।’’
डॉ. एम.एम. दास (पश्चिम बंगाल) : क्या मैं यह जान सकता हूँ कि माननीय
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सदस्य को अनुसूचित जातियों की ओर से बोलने का कौन-सा अधिकार प्राप्त है?
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इस समय, मैं केवल अपने संशोधन रख रहा हूँ। मैं उन्हें स्पष्ट करने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ; मैं अपने माननीय मित्र को यकीन दिलाने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ।
माननीय उपाध्यक्ष : कुछ लोग हैं जो स्वयं की अपेक्षा दूसरों के प्रति अधिक वफादार हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं अपने कारण बताऊँगा। इस संहिता के कतिपय भाग अतिशय हैं जो उनके एकीकरण में बाधक होगा उदाहरण के लिए उनके यहाँ विवाह और तलाक की अत्यन्त सरल रीतियाँ प्रचलित हैं। आप उनके जीवन को अधिक जटिल बना रहे हैं।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य भूल जाते हैं कि उनकी आपत्ति पूरी संहिता पर है। यदि यह कहा जाए कि उनके विवाह और तलाक अधिक सरल हैं और इन