200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री जे. आर. कपूर : यह संहिता उन गैर-हिंदुओं पर लागू है जिन पर हिंदू विधि या प्रथाओं के कुछ भाग हिंदू विधि के तहत लागू होते हैं। यह परन्तुक किसी भी उस व्यक्ति पर लागू नहीं होता है जिस पर हिंदू विधि या कोई भी भाग प्रयोज्य नहीं है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : संहिता की प्रयोज्यता अधिनियम के शब्दों पर है न कि इसके तथाकथित आंतरिक अर्थ पर।
श्री जे. आर. कपूर : शब्द बिल्कुल स्पष्ट है। परन्तुक में कहा गया है : बशर्तें कि यह प्रमाणित हो जाए कि वैसा व्यक्ति....’’ ‘‘वैसा व्यक्ति’’ का अभिप्राय उस व्यक्ति से है जिसका उद्हरण उपखंड (2) में दिया गया है और न कि अमेरिका या इंग्लैण्ड से आने वाला कोई व्यक्ति। श्री नजीरुद्दीन अहमद : प्रस्ताव है कि :-
( xii ) खंड 2 के उपखंड 2 का लोप कीजिए। मेरे लिए उपखंड दावे को ही प्रमाण मान लेना इसमें कहा गया है :-
‘‘इस संहिता के किसी भी भाग में ‘हिंदू’ अभिव्यक्ति का यह अर्थ होगा मानां, एक व्यक्ति, यद्यपि कि वह धर्म से हिंदू नहीं है, तथापि इस संहिता के प्रावधानों से शासित होता है।’’
यही प्रश्न है जिसे हमें स्पष्ट करना है। यह संहिता किन पर लागू होगी? हम कहते हैं, यदि हिंदू संहिता किसी पर भी प्रयोज्य है तो वह इसके द्वारा बाध्य है। प्रश्न यह है कि हिंदुओं के अलावा इस संहिता को किन पर प्रयोज्य होना चाहिए। यह कहना कि ‘हिंदू’ अभिव्यक्ति उन पर लागू होती है। जिन पर यह हिंदू संहिता लागू होती है, दावे को ही प्रमाण मान लेना होगा। हमें सभी विषयों को स्पष्ट करना होगा। मैं अचूकता का दावा नहीं करता हूँ। किंतु, मैंने कुछ कठिनाई महसूस की।
तत्पश्चात् प्रस्ताव है कि :-
( xi ) खंड 2 के उपखंड (4) का लोप किया जाए।
डॉ. अम्बेडकर : वह भी मेरा संशोधन है। श्री नजीरुद्दीन अहमद : प्रस्ताव है कि :-
( xii ) खंड 2 के उपखंड (4) के बाद, जोडि़ए :-
‘‘(5) इस धारा में किसी भी बात के होते हुए भी यह संहिता किसी भी राज्य में