हिंदू संहिता : जारी खंड प्रति खंड चर्चा प्रवर समिति - Page 22

7

पर वे बेकार घोषित हुए। क्या संविधान के प्रारूप के अनुसार जो हमने तय किया है, विधेयक पर पुनः विचार नहीं किया जाना चाहिए। इन विषयों को मैं आपके विचारार्थ रखना चाहूँगा।

अध्यक्ष महोदय : मैं माननीय सदस्य श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा उठाए गए

v è; {k
Col1 Col2 Col3

बिंदुओं की गंभीरता पर विस्तार से विचार करना आवश्यक नहीं समझता। उन्होंने जो कहा उसके उत्तर में यही कह सकता हूॅँ कि उनकी बातें कुछ अनुच्छेद के विषय में ही सच हो सकती हैं सभी अनुच्छेदों के बारे में नहीं। उनके बारे में बात करने का सही तरीका और समय तब होगा जब उसके विचार से कोई परन्तुक संविधान का उल्लंघन करता हो और वह विचारार्थ सामने आए, उससे पहले नहीं क्योंकि यह कहना कि सभी परन्तुक उसी तरह के हैं और इसलिए विधेयक पर विचार नहीं किया जाना चाहिए, गलत होगा।

जैसा कि माननीय सदस्य ने कहा सभी आपत्तियों को इसी संक्षिप्त तरीके से निपटाया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि मैं इस विचार से सहमत हूँ। लेकिन अगर इसे सही मान भी लिया जाए तब भी सही समय तब ही होगा जब प्रासंगिक धारा विचारार्थ हो। यदि सदन इस नतीजे पर पहुँचता है कि कोई विशेष अनुबन्ध सही नहीं है या संविधान के विरुद्ध है तो यह सदन, प्रस्तुत किए गए विधेयक में जोड़ने या घटाने के लिए पूर्ण सक्षम है। लेकिन प्रारम्भ में यह अध्यक्ष द्वारा तय नहीं किया जा सकता।

मुझे इसमें वाद-विवाद की गुणवत्ता के बारे में जानने की कोई आवश्यकता नहीं लगती कि इसमें कहाँ तक भेदभाव है या वास्तव में कहाँ तक शादी एक धार्मिक प्रश्न है आदि आदि।

मेरे विचार से अब हमें खंडवार विधेयक को आगे बढ़ाना चाहिए।