8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
खंड 2 : (संहिता का प्रयोग)
पंडित एम. बी. भार्गव (अजमेर) : मेरे नाम के साथ एक संशोधन जुड़ा है कि
खंड-1 के बाद एक नया खंड-2 जोड़ा जाए।
माननीय अध्यक्ष : हाँ यह सही है। माननीय सदस्य अब प्रस्तुत करें।
श्री त्यागी : महोदय, उससे पहले आपने एक बार जो व्यवस्था बनायी थी और जो व्यवस्था अभी बनाई है उसके संदर्भ में कुछ कह सकता हूँ। एक बार जब एक विधेयक अवैध घोषित किया जा रहा था तो मैंने व्यवस्था का एक प्रश्न उठाया था। एक मुद्दा था तो व्यवस्था यह थी कि यह न्यायालय तय करेगा वह वैध है या नहीं और वह अध्यक्ष के विचारार्थ नहीं हो सकता है। महोदय, अभी भी आपका वही विचार है या फिर आप कुछ खंडों को अवैध या संविधान के विरुद्ध घोषित करने का निर्णय का प्रयोग करना चाहेंगे?
माननीय अध्यक्ष : मैं अपना विचार बदलने का कोई कारण नहीं समझता। यद्यपि, यदि मुझे कोई आधार नजर आएगा तो मैं इस पर पूर्व विचार कर सकता हूँ।
पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब) : महोदय, साधारणतयः खंड-1 सभी खंडों के अंत में लिया जाता है। हिंदू संहिता के सम्बन्ध में मुझे लगता है कि खंड-1 के संशोधन से उनमें से कुछ प्रश्न बहुत ही मौलिक प्रकृति के होंगे। उनका संबंध कुछ राज्यों में संहिता के प्रयोग पर होगा। खंड-1 के कुछ संशोधन आज्ञा पत्र पर रखे गए हैं। क्या मैं यह अनुरोध कर सकता हूँ। कृपया विचार करें कि क्या पहले
खंड-1 को लेना सम्भव होगा?
माननीय अध्यक्ष : खंड-1 को अंत में लेने का कारण यही है कि विधेयक के विभिन्न अनुच्छेदों का अंतिम प्रारूप देखने के पश्चात् ही उसमें सभी शब्दों का प्रयोग हो सके। माननीय सदस्य खंड-1 के उपखंड (1) देखें उसमें विधेयक का क्या नाम होगा, कहा गया हैः उपखंड (2) विधेयक के क्षेत्रीय सीमा के बारे में है और उपखंड (3) विधेयक के लागू होने की तिथि से संबंधित है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : क्षेत्रीय सीमा एक मौलिक प्रश्न है।
माननीय अध्यक्ष : उसके बारे में भी विधेयक के सभी अनुच्छेदों को जानने के बाद ही स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगा। क्या विधेयक सभी परन्तुकों को भारत में सभी जगह लागू किया जा सकता है या कुछ अनुच्छेदों के बारे में कुछ राज्यों या क्षेत्रों को छूट दी जा सकती है। मेरे विचार से खंड-1 को अन्त में लेना ही लाभदायक