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पंडित मालवीय : प्रस्ताव है कि :-
खंड 2 में परंतुक जोडि़ए :-
‘‘और प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के विपरीत किसी भी बात के होने पर भी, इस अधिनियम का कार्य भी प्रावधान किसी पर भी लागू नहीं होगी, जब तक कि जिस राज्य का वह निवासी है उस राज्य में उस पर जनमत संग्रह नहीं कराया गया हो और राज्य की विधानमंडल ने तत्पश्चात् उस जनमत संग्रह के अनुसार निर्णय नहीं किया हो कि इस अधिनियम के प्रावधान उस राज्य के निवासियों पर लागू होंगे। पुनः उसके बाद भी कोई व्यक्ति यह घोषणा करने के लिए स्वतंत्र होगा कि उस पर यह अधिनियम लागू नहीं होगा और तब यह उस पर प्रयोज्य नहीं होगा।’’
श्रीमती रेणुका राय : श्रीमान्, मैं दो बातें उठाना चाहती हूँ। यह एक विलंबकारी प्रस्ताव है।
अध्यक्ष महोदय ने पिछले सत्र में व्यवस्था दी थी....
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्यों को सीधे ही शुरू नहीं हो जाना चाहिए जब तक कि मैं उन्हें नहीं कहूँ। यह बात ठीक हो सकती हैं....
श्रीमती रेणुका राय : यह व्यवस्था का प्रश्न है।
माननीय उपाध्यक्ष : हो सकता है। माननीय सदस्य को पहले अपनी जगह पर
खड़ा होना चाहिए और मैं निश्चित ही उन्हें पुकारूँगा।
डॉ. अम्बेडकर : यह संभवत खंड-1 के अंतर्गत आता है।
पंडित मालवीय : यह प्रयोज्यता की बात है न कि विस्तार की बात।
माननीय उपाध्यक्ष : उसे यहाँ जैसा है वैसे ही रहने दीजिए।
श्रीमती रेणुका राय : यह संशोधन विलम्बकारी प्रकृति का है और अध्यक्ष महोदय ने यदि आपको याद हो पिछली बार इस पर एक व्यवस्था दी थी।
दूसरी बात, मैं यह जानना चाहती हूँ कि सभा को संशोधन लिखवाने की यह प्रक्रिया, जबकि संसद प्रतीक्षा करता है क्या ऐसा दृष्टान्त बनने जा रहा है। जिसका आज के बाद भी अनुसरण किया जाएगा।
माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य भली-भाँति जानते हैं कि जहाँ तक विलम्बकारी प्रस्तावों का संबंध है। यदि सभा की रूझान उन्हें नहीं स्वीकार करने की ओर है