हिंदू संहिता : जारी - Page 225

210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तो सभा का प्रस्तावित संशोधनों पर चर्चा करने और फेंक देने के लिए स्वतंत्र है। मैं माननीय सदस्य की सलाह को स्वीकार करने को तैयार हूँ। मैंने यह विचार नहीं किया है कि क्या यह उपयुक्त है या संगत है अथवा असंगत ऐसा करने में मुझे समय लगेगा और यदि कभी ऐसा पहले हुआ है तो सभा के सामने इसे रखें। मैं यह कहना सबसे अच्छा समझता हूँ कि यह संगत नहीं है और अतएव इसका प्रश्न ही नहीं उठता है। मैं ऐसा करूँगा। जहाँ तक उसका संबंध है मैं अपना फैसला बाद में दूँगा।

श्रुतिलेख के संबंध में हम छोटे वाक्यों को लिखने के अभ्यस्त रहे हैं लेकिन मैंने कतई उम्मीद नहीं की थी कि यह एक लंबा वाक्य होगा और इसलिए मैंने स्वयं श्रुतिलेख के लिए कहा था। अब हमें आगे बढ़ना चाहिए। मैं सभा के सम्मुख इसे प्रस्ताव करता हूँ।

संशोधन रखा गया :-

‘‘और प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के विपरीत किसी भी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम का कोई भी प्रावधान किसी पर भी लागू नहीं होगा, जब तक कि जिस राज्य का वह निवासी है उस राज्य में उस पर जनमत संग्रह नहीं कराया गया हो और उस राज्य की विधानमंडल ने तत्पश्चात् उस जनमत संग्रह-2 के अनुसार निर्णय नहीं किया हो कि इस अधिनियम के प्रावधान उस राज्य के निवासियों पर लागू होंगे। (पुनः उसके बाद भी कोई यह घोषणा करने के लिए स्वतंत्र होगा कि उस पर यह अधिनियम लागू नहीं होगा और तब यह उस पर प्रयोग नहीं होगा)।’’

पंडित मालवीय : क्या मैं एक अनुरोध कर सकता हूँ। जिस पर हम विचार कर

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रहे हैं वह एक अत्यन्त ही गम्भीर विषय है....

माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य को बोलने की अनुमति होगी....

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पंडित मालवीय : मैं इस लक्ष्य की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि जब

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तक हम कतिपय मात्रा में संयम के साथ भाषा के प्रयोग के बारे में पर्याप्त रूप से सावधान नहीं होते हैं तब तक संभवतः हम सभी का समय और अपनी ऊर्जा बर्बाद ही करेंगे। मैं आपकी अनुमति से शब्द दीर्घसूत्रता के प्रयोग पर इस कारण से आपत्ति करता हूँ - एक सदस्य का दृष्टिकोण दूसरे सदस्य के दृष्टिकोण से भिन्न हो सकता है। किंतु यदि हम समझते हैं कि कुछ निश्चित बात की जानी चाहिए। और हम यह कहना चाहते हैं, तो यह काम अत्यन्त दुष्कर हो जाता है जब यह कहा जाता है कि हम दीर्घसूत्री हैं। मैं सोचता हूँ कि हमें इस विषय पर सावधान होना चाहिए।