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माननीय उपाध्यक्ष : मैंने सदस्यों से अपील की है, उसे ही मैं दोहराऊँगा संवेदनशील नहीं होना चाहिए। ‘‘विलम्बकारी’’ पूरी तरह से संसदीय शब्दावली है। माननीय सदस्य इस विधान को पारित करने के लिए चिन्तित हो सकते हैं। यह माननीय सदस्यों पर मात्र दोषारोपण करना नहीं है - कुछ विलम्बकारी प्रस्ताव हैं और कुछ सारगर्भित प्रस्ताव हैं। अतएव यह पूरी तरह से संसदीय शब्दावली है। किंतु मैं सभा के सभी वर्गों से अपील करता हूँ। (हम लोग बहुत ही पवित्र कार्य में जुटे हैं।) यह प्रश्न हिंदू विधान का है और हमारे सामने जो प्रश्न है वह विवाह और अन्य बातों से संबंधित है। हमें पूरी गंभीरता से इस समस्या पर स्वयं से कहना चाहिए हम अपने मतभेदों को दूर कर सकते हैं और हम यहाँ न केवल एवं मिलन स्थान का निर्माण कर सकते हैं बल्कि शेष देश को इस विषय में नेतृत्व दे सकते हैं जो कि हमारे संसद के प्रयोजन भी है। इसलिए, मैं उम्मीद करता हूँ कि यहाँ पर धैर्य बना रहेगा और स्वस्थ मनोदशा के साथ हम खंडों पर विचार करेंगे। यद्यपि प्रत्यक्ष तौर पर कोई खास संशोधन प्रारम्भ में अरुचिकार हो सकता है, हम सुनें और अपना फैसला बाद में दें। सभा में उपस्थित भी वर्गों से मेरा यही सादर अनुरोध है। इस विवाद में किसी को भी घी डालने की अनुमति नहीं होगी। हमें शांत रहना चाहिए।
श्री आर. के. चौधरी : श्रीमान्, क्या मैं आपकी सलाह माँग सकता हूँ....
डॉ. अम्बेडकर : आपको बार-बार सलाह की जरूरत क्यों पड़ जाती है?
श्री आर. के. चौधरी : अभी आपने श्रीमती रेणुका राय को मैडम कह कर संबोधित किया था। क्या किसी सदस्य को पीठ द्वारा इस तरह से सम्बोधित होने का अधिकार है?
माननीय उपाध्यक्ष : मुझे खेद है। मैं अपनी गलती सुधारना चाहूँगा। मैं किसी भी सदस्य का दूसरे सदस्य के द्वारा एक वचन में संबोधित किया जाना पसन्द नहीं करूँगा। इसी तरह से मैं किसी भी सदस्य को सीधे संबोधित नहीं करूँगा। मैं सचेत रहने का प्रयास करूँगा। किंतु मुझे इन बातों को बताने की कोई जरूरत नहीं है। अब हमें आगे बढ़ना चाहिए। हम लोगों के पास जरूरत से ज्यादा सलाह है।
गृह मंत्री (श्री राजगोपालचारी) : महोदय, मैं समझता हूँ कि पिछले संशोधन में
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व्यवस्था का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ है?
माननीय उपाध्यक्ष : सभी संशोधनों पर। मैंने उन संशोधनों को केवल चर्चा के प्रयोजन से रखा था। किसी भी समय सभा या मैं इस पर विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं।