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श्री भारती (मद्रास) : महोदय, उनकी कठिनाई आपने जो कहा है उससे संबंधित प्रतीत होती है। आपने कहा था कि जिन्होंने संशोधन रखे हैं उन्हें अधिमानता प्रदान की जाएगी।
माननीय उपाध्यक्ष : मैंने यह नहीं कहा है कि मैं इसे सीमित करने जा रहा हूँ। जब तक सभा स्वयं इस पर प्रतिबंध न लगा दे सभी को मौका मिलेगा। मैंने सिर्फ यह सूचित किया है कि जिन सदस्यों ने कई संशोधन पेश किए हैं उन्हें अधिमानता दी जाएगी। दूसरे भी बोल सकते हैं।
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माननीय उपाध्यक्ष : डॉ. मुखर्जी- चूँकि उन्होंने कोई भी संशोधन पेश नहीं किया है।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : मैं भी उन्हीं सदस्यों में से एक हूँ....
श्री राजगोपालाचारी : यह सभी नियमों के विरुद्ध है।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : महोदय, जिन्होंने कोई संशोधन पेश नहीं किया है, और न ही मैंने किया है, इस महत्वपूर्ण विधान पर विधेयक के पुनःस्थापित होने के बाद से किसी भी समय नहीं बोले हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : वह उस समय मंत्री थे।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : श्रीमान्, हम यहाँ लगभग सात महीनों के बाद हिंदू संहिता विधेयक पर विचार करने के लिए एकत्रित हुए हैं। इस अवधि में कई बातें हो चुकी हैं। यदि मैं ऐसा कहूँ कि, यह कुछ संतोष का विषय है कि सरकार ने अपना दिमाग
खुला रखा है और सदन के अंदर या बाहर की गई आलोचनाओं से निपटने हेतु सरकार ने स्वयं ही संशोधन किया है।
श्री गाडगिल : तर्क संगत!
डॉ. एस. पी. मुखर्जी- मेरा विश्वास है कि हमारे देश के इतिहास में किसी भी विधान ने इसके पक्ष या विपक्ष में इतनी अधिक आलोचनाओं को जन्म नहीं दिया होगा।
श्रीमती रेणुका राय : सती के उन्मूलन के संबंध में क्या हैं?
माननीय उपाध्यक्ष : किसी भी माननीय सदस्य को दूसरे माननीय सदस्य के
* सं. वा. वि. खंड- XV, भाग- II, 17 सितम्बर, 1951, पृष्ठ 2705-23