हिंदू संहिता : जारी - Page 229

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वक्तव्य में व्यवधान डालने की आवश्यकता नहीं है। मैंने पहले ही कहा है कि इससे उत्तेजना पैदा होगी। किसी माननीय सदस्य को जो कुछ भी पसंद नहीं है उस पर दूसरे माननीय सदस्य द्वारा नहीं थोपा जाना चाहिए।

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : अभी हम जिस खंड पर विचार कर रहे हैं वह सामान्य

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प्रकृति का है। यह संपूर्ण संहिता की प्रयोज्यता का प्रश्न खड़ा करता है और उस दृष्टिकोण से मैं कुछ सामान्य टिप्पणी करना चाहता हूँ जो कि संगत प्रकृति का होगा।

प्रश्न यह उठा है कि क्या संहिता को हिंदुओं पर उसी रूप में जिसकी चर्चा की गई है या व्यक्तियों के उन अन्य वर्गों पर जिसमें सिख, जैन और बौद्ध भी सम्मिलित हैं पर जैसा कि माननीय विधि मंत्री के द्वारा रखे गए संशोधन में उल्लिखित है, प्रयोज्य किया जाना चाहिए। यह भी प्रश्न उठाया गया है कि क्या संहिता को भारत के सभी नागरिकों पर प्रयोज्य नहीं होना चाहिए। मैं जानता हूँ कि यह विषय पिछले फरवरी से सदन के पटल पर उठाया गया था और मैं इसे बहुत विस्तार से बताना नहीं चाहता हूँ किन्तु मैं अवश्य कहूँगा कि संविधान के उस अध्याय से जिसमें राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख है पता चलता है कि नए संविधान के तहत संसद ने ऐसी संहिता को पारित करने का आह्वान किया है जिसे सभी नागरिकों पर प्रयोज्य होना है - एक अखिल भारतीय नागरिक संहिता। जब इस विधेयक पर चर्चा आरम्भ हुई थी, हम परिस्थितियों के बिल्कुल भिन्न समुदाय के अंदर काम कर रहे थे। इसलिए यह खेद का विषय है कि नई सरकार संविधान के पारित हो चुकने के बावजूद इस भाँति के विधान को जो कि समुदाय के केवल एक वर्ग पर प्रयोज्य है, लेकर बढ़ना चाहती है। यह कहा गया है कि हम पंथ निरपेक्ष राज्य हैं। वस्तुतः हम बहुधा ‘धर्मनिरपेक्षता’ कहा जाता है। यह कहाँ तक संसद के लिए खुला है - मैं कोई तकनीकी मुद्दा नहीं उठा रहा हूँ - किंतु संसद के लिए एक ऐसा कानून पास करना कहाँ तक वांछनीय होगा हो समुदाय के केवल एक वर्ग पर प्रयोज्य होगा? मैं जानता हूँ कि विधि मंत्री का उत्तर क्या है। क्योंकि उन्होंने अपने पहले के एक भाषण में इसका प्रतिवाद किया था। उन्होंने कहा कि यदि देश वास्तव में यह चाहता है तो एक अखिल भारतीय नागरिक संहिता की रूपरेखा तैयार करने में कोई कठिनाई नहीं है। यदि उत्तर वह है तो क्यों नहीं हम वैसी संहिता बनाएं? यदि इस संहिता में सुझाए गए कुछ प्रावधानों को अन्य समुदायों, विशेषकर मुस्लिमों पर प्रयोज्य करने के प्रस्ताव किए जा सकते हैं, इस पर मुझे अत्यधिक संदेह है। हम एक विवाह प्रथा के प्रश्न पर चर्चा कर रहे हैं, मेरा विश्वास है कि यह कोई भी मानता होगा कि एक विवाह प्रथा केवल हिंदुओं के लिए या केवल बौद्धों के लिए