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या केवल जैनों के लिए अच्छी है। मेरा विश्वास है कि जो एक विवाह प्रथा की वकालत कर रहे हैं वह ईमानदारीपूर्वक समझते हैं कि यह प्रथा सिद्धांततः अच्छी है और इसे सबों के लिए प्रयोज्य बनाया जाना चाहिए - यदि इस सुसंस्कृत विश्व में सभी व्यक्तियों पर नहीं तो कम से कम भारत के सभी नागरिकों पर जो इस संसद के द्वारा पारित कानूनों के द्वारा शासित होने के बाद आई है। अब केवल एक विवाह प्रथा से संबंधित एक अलग विधेयक क्यों नहीं प्रयोज्य बनाया जाए? इस पर क्या आपत्ति है? इस पर आपत्ति उस ओर से उठायी जा सकती है जिसकी ओर विधि मंत्री ने इशारा किया है, मेरा मानना है श्री नजीरुद्दीन अहमद।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं एक ही पत्नी से पर्याप्त रूप से परेशान हूँ। मैं दो पत्नी नहीं चाहता।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : विधि मंत्री को उनका उत्तर मिल गया है। किसी भी स्थिति में यदि एक विवाह प्रथा का उपाय करने वाला विधेयक पुनःस्थापित किया जाता है....
पंडित ठाकुरदास भार्गव : मैंने इस सदन में उसी तरह वाले एक विधेयक को पुनःस्थापित किया है।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : यदि ऐसा विधेयक पुनःस्थापित किया जाता है तो विधि मंत्री को कम से कम श्री नजीरुद्दीन अहमद का समर्थन मिलेगा। लेकिन वास्तविक कारण तो यह है कि सरकार को मुस्लिम समुदाय को छूने की हिम्मत नहीं है। श्री भारती : क्यों?
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : आप जाँच कीजिए।
श्री गाडगिल : प्रतीक्षा कीजिए और देखिए।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : मैं एक सुझाव दे रहा हूँ। विधि मंत्री को यह घोषणा करने दीजिए कि विधेयक में संशोधन किया जाएगा और एक विवाह प्रथा का उपाय करने वाला भाग मुस्लिमों पर भी लागू होगा।
श्री राजगोपोलाचारी : क्या हम हिम्मत देखने के लिए कानून बनाने वाले हैं?
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : कभी-कभी कानूनों का निर्माण व्यक्तियों और सरकार की ईमानदारी को परखने के लिए किया जाता है और इसलिए आज सरकार एवं गृह मंत्री की ईमानदारी और पक्षानुराग पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है।