हिंदू संहिता : जारी - Page 231

216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री भारती : बिल्कुल नहीं।

डॉ. अम्बेडकर : नहीं, नहीं।

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : मैं इस प्रश्न पर अमल करने नहीं जा रहा हूँ क्योंकि मुझे इस विधेयक के प्रवर्त्तकों की दुर्बलता का पता है। उन्हें मुस्लिम समुदाय को छूने की हिम्मत नहीं है। पूरे भारत वर्ष में, श्री नजीरुद्दीन अहमद जैसे व्यक्ति के द्वारा नहीं बल्कि अन्य कई व्यक्तियों द्वारा इतना विरोध किया जाएगा कि सरकार इसे आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं करेगी। लेकिन निःसंदेह आप किसी भी तरीके से हिंदू समुदाय के साथ बढ़ सकते हैं और भले ही इसका कुछ भी परिणाम हो।

श्री राजगोपालाचारी : क्योंकि हम समुदाय हैं।

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : सभा से और सरकार से मेरी अपील कुछ अलग आधार पर होगी। मैं अपने वक्तव्य को अत्यधिक विवादित नहीं करना चाहता हूँ।

श्री कामथ : क्यों नहीं? आप इसे जितना विवादित बना सकते हैं, बनाइये।

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : क्योंकि मैं एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहता हूँ जिसमें सामाजिक सुधार पर प्रभाव डालने वाले विषयों पर लेन-देन की पद्धति पर चर्चा की जा सके। यह प्रेस विधेयक नहीं है जिसे विधि मंत्री, गृह मंत्री की ओर से प्रायोजित कर रहे हैं। हम नहीं चाहते हैं कि समाज सुधार से संबंधित एक विधेयक को आसानी से पारित कराने में सहायता करने के लिए संसद के बाहर पुलिस तैनात रहे। इससे किसी को कोई सहायता नहीं मिलेगी कोई भी विधायक जिसका प्रयोजन समाज सुधार लाना है के पीछे इस देश की जनता का भारी समर्थन होना चाहिए। मैं गृहमंत्री को खड़ा होते हुए देख रहा हूँ।

श्री राजगोपालाचारी : मैं हस्तक्षेप नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल उनकी सहायता कर रहा हूँ। मेरे हस्तक्षेप ने माननीय सदस्य के बहस को एक मोड़ दे दिया है। मैं केवल एक खास तर्क पर आपत्ति कर रहा था। मैं पूरी तरह से सहमत हो सकता हूँ यदि वह मित्र आधार पर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

एक माननीय सदस्य : इसलिए, आप एक समर्थक हैं!

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : जैसे-जैसे उनका पद से अवकाश प्राप्त करने का समय नजदीक आता जा रहा है उतनी ही तेजी से गृह मंत्री को बातें समझ में आने लगी हैं। खैर जो भी हो, यदि हम इस देश में समाज सुधार चाहते हैं, तो हम यथासंभव व्यक्तियों के बड़े वर्ग को अपने साथ लेकर चलना पसंद करेंगे।