220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रावधान होना चाहिए। ये दो बातें हैं जिस पर अत्यधिक जोर दिया गया है। अब हमें फिलहाल तलाक को लेते हैं। आपने भारतीय विधानमंडल से अपने कानूनों को पारित करा दिया तो तलाक की अनुमति देते हैं। एक चरण पर हिंदू नागरिक कानून के तहत विवाह नहीं कर सकता है जब तक कि वह घोषणा कर दे कि वह हिंदू नहीं था। यहाँ तक कि वह भी बदल चुका है। एक हिंदू रहते हुए भी विवाह का संविदा कर सकता है जो उसके या उन दोनों की रुचि के अनुरूप होगा। इसी तरह से अन्तरजातीय विवाह के संबंध में आपने पहले ही कानून पारित कर दिया है और संबंधित व्यक्तियों के हिंदू चरित्र पर विपरीत प्रभाव डाले बिना ही वैसे अन्तरजातीय विवाहों को अनुगम्य बना दिया है। यहाँ तक कि सगोत्र विवाह को जिसे समाज के बहुत बड़े वर्ग में अत्यन्त ही क्रांतिकारी समझा जाता है को संसद के द्वारा पारित कानून ने अंगीकार किया है।
डॉ. टेक चन्द : पिछले संसद के द्वारा !
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : विधानसभा के द्वारा।
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ये बातें इस देश की विधानमंडल द्वारा विवाह संबंधी कानूनों के प्रगामी विकास- यदि मैं ऐसा कह सकूँ - की माँगों को कैसे पूरा किया गया है कि सूचक है। यह विषय हमारे संविधान के समवर्ती सूची में रखा गया है और मैं मानता हूँ कि बम्बई और मद्रास ने इस विषय पर कानून पारित कर दिया है।
(एक माननीय सदस्य : मैसूर ने भी)। कई राज्यों में एक तरह से या दूसरे तरह से प्रान्तीय कानूनों को पारित कर दिया गया है। (एक माननीय सदस्य : उत्तर भारत में नहीं) ये प्रावधान जनता की आकांक्षाओं से मेल खाते हैं। अब मुद्दा यह है। आप क्यों नए कानूनों को सभी हिंदुओं पर बाध्यकारी बनाना चाहते हैं? आप नहीं चाहते हैं कि संबंधित पक्षों की इच्छा के विरुद्ध जनता द्वारा तलाक की पद्धति का लाभ उठाना चाहिए या इसका लाभ अवश्य ही उठाना चाहिए। यह एक समर्थकारी विधान है और वह शक्ति पहले ही विद्यमान है।
दूसरी ओर, आप करोड़ों लोगों की भावनाओं पर कैसा करारा प्रहार कर रहे हैं? अभी आपने सांस्कारिक विवाह के इस रूप को दस्तावेज पर रखा है। आपने इसकी परिभाषा, इसे थोड़ा प्राच्य और आकर्षक रंग देने के लिए सांस्कारिक से बदल कर धार्मिक कर दी है। निःसंदेह इससे इसका सार नहीं बदला है। मैं इस सभा के सदस्यों से जो इस विधेयक का समर्थन कर रहे हैं से पूरी गंभीरता से पूछता हूँ - यह क्या है जो आप इस प्रस्ताव को निष्पादित कर रहे हैं?