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जहाँ तक सांस्कारिक विवाह का प्रचलन है, यह एक विचारधारा है जिसकी करोड़ों लोगों - शिक्षित और अशिक्षित, साक्षर और निरक्षर के मस्तिष्क में गहरी पैठ है - हिंदू विवाह का चिरस्थाई स्वरूप। वह धर्म का मामला है। यह मात्र शारीरिक संबंधों का मामला नहीं है। करोड़ों के मस्तिष्क को यह भावना गहराई से जकड़े हुए है और मैंने न केवल अपने प्रान्त में बल्कि भारत के विभिन्न भागों में अनेक लोगों से बात की है। जिन लोगों को बहुतेरे कारणों से तलाक संबंधी कानून का लाभ उठाने की दूर-दूर तक संभावना नहीं है इस विचार से झटका लगा है। और कई व्यक्ति जिनका प्रयोजन अच्छा है, सुधारवादी है सुझाव देते हैं कि यदि आज इस देश में हिंदू हैं जो तलाक की आधुनिक पद्धति का लाभ उठाना चाहते हैं और हिंदू विवाह की धार्मिक प्रकृति को दूर करना चाहते हैं, तो उन्हें विद्यमान कानून के तहत पर्याप्त अवसर दिया गया है। तथापि उन्हें अत्याधुनिक और संपूर्णतः अद्यतन बनाने के लिए यदि कानून का पुनरीक्षण करना पड़े तो अनेक लाभ के लिए कानून का पुनरीक्षण होना चाहिए। किंतु हिंदू विवाह के मौलिक और पवित्र स्वरूप को क्यों समाप्त करें? यह क्या है जो आप उससे लाभ उठाएंगे? मैं इस प्रश्न का कोई भी संतोषजनक उत्तर नहीं पा सका हूँ। क्योंकि यह हकीकत नहीं है कि नई पद्धति जिसका निर्धारण किया जा रहा है वह अनिवार्यतः सभी हिंदुओं द्वारा स्वीकार किया जाएगा। अतएव, यदि विकल्प दिया जाता है और यदि जनता उस विकल्प का लाभ उठाती है तो यह सहज ही आपकी बात की जीत है।
मुझे बताया गया कि भारत में भी, जो भारत आज है, शूद्रों में 90 प्रतिशत हैं जिनमें किसी न किसी प्रकार तलाक या विवाह विच्छेद की प्रथा विद्यमान है। बिल्कुल ठीक, तब उसी में अन्तर है। आपने हिंदू विधि बनाई है जो उन जातियों और समुदायों में, जो इसे चाहती हैं, विवाह के विच्छेद का प्रावधान करती है। आप कह सकते हैं, ठीक है भारतीय जनसंख्या के 10 या 15 प्रतिशत को क्यों इन परिवर्तनों के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए? यह परिवर्तनों के विरुद्ध किसी की भी स्थिति का प्रश्न नहीं है। यदि आप आगे बढ़ना चाहते हैं या पीछे हटना चाहते हैं - जो भी हो : आपका इसके लिए स्वागत है। लेकिन दूसरों का जिनका आप में विश्वास नहीं है और वे भी जिनका विश्वास कुछ ऐसी बातों में है जो पूरी तरह से नैतिक दृष्टि से औचित्यपूर्ण और मानवीय आचरण के सर्वोच्च मापदंडों के अनुरूप हैं। उन्हें क्यों घसीटें? मैं इस मौलिक प्रश्न का उत्तर नहीं पा सका हूँ।
हमें बहुधा यह कहा जाता है कि हमारी पद्धति पिछड़ी हुई है। महान् भारतीयों और महान पाश्चात्य विद्वानों के लेखों के कई उद्धरण मेरे पास हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों और कठिनाइयों के बावजूद हिंदू समाज ने जिस तरह से अपने अस्तित्व