हिंदू संहिता : जारी - Page 244

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है और जिनके दृष्टिकोण आपके दृष्टिकोण से मिलते हैं उनके लिए आप वह प्रबंध करते हैं जो आप चाहते हैं, तो आप क्यों अपने विचारों को दूसरे करोड़ों लोगों पर हैं जो आपके दृष्टिकोण से भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं थोप रहे हैं? यह एक नजरिया है जिसका मैं माननीय विधि मंत्री और सरकार के सामने जोरदार वकालत करता हूँ। यदि मैंने आपको फार्मूला दिया था जो उन लोगों के लिए जो इसमें विश्वास करते हैं के लिए इस संहिता के प्रावधानों के परित्याग को निर्दिष्ट करता है तो आप मुझे दोष दे सकते हैं। किंतु मैं आपकी सफलता की मंगलकामना करता हूँ; आगे बढं़े; और उन लोगों के लिए जो उस विचारधारा में जिसकी आप यहां उपदेश दे रहे हैं के लिए आप जो चाहें वह करें। किंतु दूसरों के मामले में जो और जिनके पूर्वज पुरानी परम्परा के साथ चलते रहे थे और जो इस विधेयक के प्रयोजकों से कतई भी कम देशभक्त भारतीय नहीं हैं पर आप अपना विकल्प क्यों थोप रहे हैं?

क्या देश में जहाँ अब तलाक की पद्धति विद्यमान है तलाक की चर्चा और तलाक के कानून ने सभी सामाजिक समस्याओं का समाधान कर दिया है?

श्री हिम्मतसिंघका (पश्चिम बंगाल) : और समस्याओं को जन्म दिया।

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डॉ. एस. पी. मुखर्जी : मैं हाल ही में लिखी गई समाज शास्त्र की कुछ पुस्तकों को गौर से देख रहा था। लोग उद्विग्न हैं क्योंकि यह एक जटिल मानवीय समस्या है। इन समस्याओं का समाधान शब्द में नहीं है। जिन्होंने तलाक की पद्धति को स्वीकार किया है उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। क्या वे शांति पाते हैं? क्या उन्होंने

खुशी पा ली है? एक माननीय सदस्य : नहीं।

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : दूसरी ओर नई समस्याएँ खड़ी हो गई हैं। मनो-विश्लेषण पर हाल में लिखी गई कुछ पुस्तकों को पढि़ए। उसमें यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि पश्चिमी देशों में जो बुराई है उसमें से अधिकांश स्त्रियों- पुरुषों के बुरे समायोजन की वजह से है। ये समस्याएँ जटिल हैं। क्यों पश्चिम का अन्धानुकरण कर रहे हैं, क्योंकि विश्व के कुछ हिस्सों से कुछ लोग आए हैं और आपसे वैसा कहा है। क्या आप जब तक इन्हें स्वीकार नहीं करते हैं तब तक पिछड़े हैं? यदि इस देश में अग्रगामी लोग हैं जो इस विचारधारा में विश्वास करते हैं, उन्हें एक लम्बी रस्सी दीजिए इतनी लम्बी कि वे उसमें लटक कर फाँसी लगा सकें। किंतु उनके मामलों में हस्तक्षेप नहीं कीजिए जिन्होंने अपनी समस्याओं का समाधान विभिन्न प्रकार से ढूँढ़ लिया है।

जहाँ तक एक विवाह प्रथा का प्रश्न है। इसका मैं एक अपवाद के साथ समर्थन करूँगा। इसे भारत के सभी नागरिकों पर प्रयोज्य बनाइये। यह सवाल नहीं है कि