हिंदू संहिता : जारी - Page 245

230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक विवाह प्रथा हिंदुओं के लिए अच्छी है और एक विवाह प्रथा दूसरों के लिए अच्छी नहीं है। एक सामाजिक सिद्धांत की हिमायत कीजिए।

पंडित ठाकुरदास भार्गव : इसे क्यों बलपूर्वक उन लोगों पर थोपा जाए जो इसमें विश्वास नहीं करते हैं?

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : यदि आप विश्वास करते हैं कि एक सामाजिक पद्धति के रूप में एक विवाह प्रथा भारत के लिए सर्वोत्तम है तब इसे हिंदू दरवाजे के माध्यम से देखने का प्रयास मत कीजिए। इसे मानवीय द्वार के माध्यम से देखने का प्रयास कीजिए और इसे सभी पर प्रयोज्य बनाइये। कम से कम इस मामले में धर्मनिरपेक्ष राज्य की तरह व्यवहार कीजिए। पौरुष के साथ कहिए कि एक विवाह प्रथा भारत के सभी नागरिकों के लिए प्रयोज्य बनाई जाएगी। यदि आप यह नहीं कर सकते हैं, केवल एक वर्ग के लिए यह नहीं कीजिए।

यहाँ, हम आँकड़ों की दुनिया में रह रहे हैं। हम आँकड़ों में आस्था रखते हैं भले ही यह वास्तविक हो या मनगढं़त। मैं कुछ सूचना प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूँ; लेकिन मैं नहीं प्राप्त कर सका। मैं जानना चाहता था कि भारत में कितने लोग दूसरी बार विवाह कर रहे हैं।

श्री हिम्मतसिंघका : और यह एक ही समय में दो पत्नियों को रखना।

डॉ. एस. पी. मुखर्जी : वही मेरा तात्पर्य है - पहली पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी पत्नी से विवाह करना। संख्या अत्यन्त ही सीमित है। वास्तव में यह कोई समस्या नहीं है। पहले ही आधुनिक दृष्टिकोण के कारण समाज ने अपने आपको समायोजित कर लिया है और आर्थिक दशाओं, साधारण जन-निन्दा इत्यादि के कारण यह प्रथा समाप्त हो गई है। क्यों यह आडम्बर कर रहे हैं कि आप एक महान सुधार ला रहे हैं और इसके लिए विधायन कर रहे हैं? यदि आप इसे स्वीकार करते हैं, तो जैसा कि मैंने अभी-अभी कहा इसे पूरे भारत पर प्रयोज्य कीजिए।

जहाँ तक हिंदू संहिता विधेयक का प्रश्न है। मैं नहीं जानता कि क्या फैसला होने जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इशारा किया है कि संभवतः हम शेष विधेयक को आगे नहीं बढ़ाएंगे और हमारे पास समय का अभाव हो मैं यह प्रस्ताव करने को तैयार हूँ। पूरी हिंदू संहिता को, जैसा है वैसा ही पारित कर दीजिए; केवल इसे वैकल्पिक बना दीजिए। जो इसे चाहते हैं वे इसे स्वीकार कर सकते हैं। मैंने चरम कट्टरपंथी सम्प्रदाय के प्रतिनिधियों को कहा है; मैंने उनके साथ तर्क-वितर्क किया है। यद्यपि कि उनमें से कुछ इस तरह के किसी भी विधेयक के पारित किए जाने के विरुद्ध हैं, चाहे जो भी हो वे यह भी मानते हैं कि जैसे वे अपने बारे में सोचने