हिंदू संहिता : जारी - Page 247

232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विद्यमान रही है। हमने इन सबसे अपने अस्तित्व की रक्षा की है और अब हम एक स्वतंत्र देश हैं, तथा अपनी पुरानी उपलब्धियों की तुलना में और अधिक भव्य भविष्य के साथ जीना चाहते हैं। किंतु जब भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ विचारों की भिन्नता है, जहाँ मनोवृत्ति की भिन्नता है और जहाँ विचारधाराएँ अलग-अलग हैं, आप सामाजिक सुधार शुरू करते हैं तो ऐसा करने का सिर्फ एक ही रास्ता है धीरे-धीरे बढ़ें। मैं आपको उन सिद्धांतों को जिसे आप सत्य समझते हैं को छोड़ने के लिए नहीं कह रहा हूँ। किंतु कृपया जनता, हिंदू जनता जो अभी भी उन धार्मिक नियमों और संहिताओं के अधीन रहने का दावा कर रही है जो किसी भी तरह से विश्व के किसी भी भाग में विद्यमान नियमों और संहिताओं से किसी भी तरह से भय नहीं है, के पास जाइये और उसे भरोसा दिलाइये उन्हें अपने लिए चयन करने का अवसर दीजिए। सदन और सरकार से मेरी यह अपील है और मैं आशा करता हूँ कि मेरी अपील पर ध्यान दिया जाएगा।

* श्री बी. के. पी. सिन्हा : निष्ठुर प्रारब्ध मुझे हमेशा डॉ. मुखर्जी के विरुद्ध खड़ा

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कर देता है जो न केवल सदन में बल्कि देश के सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में से एक हैं। डॉ. मुखर्जी और इस विधेयक के अन्य विरोधियों ने एक सुझाव दिया है। ‘‘एक नागरिक संहिता क्यों नहीं हो? इस विधेयक के दायरे को भारत की सभी जातियों और समुदायों तथा धार्मिक समूहों को समेटने के वास्ते क्यों नहीं और विस्तृत कर दिया जाता है?’’ और वे भी कहते हैं, ‘‘इस विधेयक के विभिन्न प्रावधानों को स्वीकार करना विभिन्न राज्यों और विभिन्न लोगों पर क्यों नहीं छोड़ दिया जाए?’’ इस विधेयक के प्रस्तावक ने प्रभावशाली तरीके से इन आलोचनाओं का उत्तर दे दिया है। इस विधेयक के विरोधियों ने विभिन्न लोगों के बीच भेद-भाव के संबंध में संविधान के खंड का भी हवाला दिया है। उनका यह आपत्ति संविधान के उस खंड या उस अनुच्छेद की दृष्टि से थी। यदि आपके विधेयक में प्रावधान हैं जो केवल एक समुदाय पर लागू होते हैं तो यह संवैधानिक रूप से वैध नहीं होगा। उस संबंध में उन्होंने बम्बई और मद्रास के कुछ न्यायालयों के कतिपय निर्णयों का भी उल्लेख किया है। लेकिन वे निचले न्यायालयों के निर्णय थे और उसके बाद से बम्बई उच्च न्यायालयों ने उसे भेजे गए मामलों में यह फैसला दिया है कि संविधान के भेदभाव अनुच्छेद का कोई उल्लंघन नहीं हुआ था और उन अनुच्छेद के होने पर भी हम हिंदू समुदाय के लिए, अन्य समुदायों के अपवर्जन तक कानून बना सकते हैं। अतएव यह मुद्दा सुलझ गया है।

फिर इसे जनमत संग्रह के द्वारा फैसला करने हेतु विभिन्न राज्यों या जनता पर छोड़ने का प्रश्न है। उन्होंने किन आधारों पर इस बहस को आगे बढ़ाया है? वे

* संसदीय वाद विवाद खंड- XV, भाग- II, 17 सितम्बर, 1951, पृष्ठ 2723-32