हिंदू संहिता : जारी - Page 248

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कहते हैं कि इस विधेयक के प्रावधान हिंदू विधि के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हैं, कि वे क्रांतिकारी हैं और कि ये कानून में दूरगामी परिवर्तन करने वाले हैं, और यह कि ये परिवर्तन कतई जरूरी नहीं हैं। उन्होंने अपनी आपत्ति के समर्थन में ये तर्क दिए हैं। मुझे इस विधेयक के प्रावधानों की जांच करने दीजिए और देखने दीजिए कि उनकी आपत्ति क्या निचोड़ है। इस समय के लिए मैं अपने आपको विवाह और तलाक के सवाल तक सीमित रखता हूँ क्योंकि यही एक मात्र अध्याय है जिस पर चर्चा होने जा रही है।

पंडित एम. बी. भार्गव (अजमेर) : कृपया अपने आपको खंड-2 तक सीमित

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कीजिए।

श्री बी. के. पी. सिन्हा : जी हाँ, मैं स्वयं को खंड-2 तक सीमित रखता हूँ और मैं अपने वक्तव्य में केवल विवाह और तलाक अध्याय की बात करूँगा। मैं इससे बाहर नहीं जाऊँगा। इस अध्याय की विशेषताएँ क्या हैं? इसकी चार विशेषताएँ हैं। पहला यह कि विवाद का दायरा और विस्तृत होता है। आप किसी विशेष उपजाति या समूह के बाहर विवाह कर सकते हैं और तब भी विवाह अवैध नहीं होगा और उनकी सन्तान भी अवैध नहीं होगी। दूसरा यह कि यह विधेयक निषेध के दायरे को प्रतिबंधित और सीमित करता है। कई प्रकार के निषेध हैं। एक व्यक्ति निश्चित जातियों के बाहर विवाह नहीं कर सकता है। एक व्यक्ति अपने ही गोत्र या प्रवर में तथा पिता और माता के कतिपय संबंधियों से विवाह नहीं कर सकता है। यह विधेयक इन निषेधों को सीमित करता है। और फिर यह एक विवाह प्रथा का सिद्ध ांत शुरू करता है और सबसे अंत में तलाक संबंधी सिद्धांत रखता है।

सबसे पहले विवाह के दायरे को विस्तृत बनाया जाना है। क्या इस विधान के प्रावधान वास्तव में हिंदू विधि या हिंदू धर्म के सिद्धांत के विरुद्ध हैं? मेरे विचार में वे विरोध में नहीं हैं। डॉ. मुखर्जी ने कहा यह विधान कट्टर पंथी लोगों को आहत करता है, कि यह उनकी धार्मिक भावनाओं और उनके धार्मिक मर्म को ठेंस पहुँचाता है। मुझे यह स्वीकार करने में शर्म नहीं है कि मैं किसी भी दूसरे व्यक्ति के बराबर ही स्वयं को कट्टरपंथी मानता हूँ। क्या गंगा के तट पर जब हम वहाँ स्नान करने गए, मैं डॉ. मुखर्जी से बहुधा नहीं मिला हूँ। हम लोग बनारस में भगवान शिव के मंदिर में भी बहुधा मिले हैं। हम लोगों का कट्टरवाद एक ही प्रकार का और बराबर परिमाण में ही है। फिर भी मैं इस विधेयक में ऐसा कुछ नहीं पाता हूँ जो मेरी धार्मिक भावनाओं और मर्म को चोट पहुँचाता है। हिंदू समाज की आधुनिक या मूल स्थिति क्या थी? वह हम महाभारत के पाठों और अन्य ग्रन्थों में देखते हैं। उस समय आज की तरह जाति भेद नहीं था। उस समय काम के अनुसार विभाजन था।