234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री श्यामानंदन सहाय : प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र है। संस्कार से वह ब्राह्मण होता है।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : किंतु कतिपय विपरीत कारणों से स्थिति बदल गई। ठीक है, मैं उद्धरण देना और चर्चा को लम्बा नहीं बनाना चाहता अन्यथा मैं भी आपका ही
खेल खेलता होऊँगा। ठीक है, जैसा कि मैं कह रहा था, आज जो भेदभाव विद्यमान हैं वह पहले नहीं था। प्रत्येक आर्य दूसरे आर्य से विवाह के लिए स्वतंत्र था। आप जानते हैं कि हिंदू विधि के द्वारा अनुलोम और प्रतिलोम विवाह को स्वीकृति दी गई थी। और इस विधान के प्रावधानों को स्वीकार कर के मुझे विश्वास है कि हम पुरानी व्यवस्था की ओर लौट रहे हैं। किंतु देश में कतिपय दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं ने पुरानी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
पंडित मालवीय : क्या माननीय सदस्य कृपया इस पर थोड़ा और प्रकाश डालेंगे?
श्री बी. के. पी. सिन्हा : मैंने इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। यदि हमें और प्रकाश डालना है तो हमें सात दिनों तक चर्चा करनी चाहिए।
पंडित मालवीय : मैं सीखना चाहता हूँ। मैं विषय-वस्तु को और माननीय सदस्य जो बोल रहे है उसे समझना चाहता हूँ। मैं यह जानना चाहता हूँ कि भारत में प्रतिलोम विवाहों को कहाँ अनुमति थी।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : आप हिंदू विधि पर किसी भी ग्रन्थ में यह पाएंगे कि अनुलोम और प्रतिलोम विवाह प्रचलित थे।
माननीय उपाध्यक्ष : अनुलोम विवाहों की अनुमति थी, प्रतिलोम विवाहों की नहीं।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : इसकी अनुमति नहीं थी। संतान को चांडाल के रूप में जाना जाता था और वे हिंदू समाज की शाखा थे।
माननीय उपाध्यक्ष : संसद के अधिनियमों के द्वारा उन सबका हल कर लिया गया है।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : इस संबंध में संसद के अनेक अधिनियम हैं जैसे विशेष विवाह अधिनियम, 1872, हिंदुओं, सिखों और जैनों के बीच और विभिन्न जातियों एवं उपजातियों के बीच विवाहों को अनुमति प्रदान करने वाला 1949 का हिंदू विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम, फिर है हिंदू विवाह (निर्योग्यता का हटाना) अधिनियम जो