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एक ही जाति के उपविभाजनों के बीच विवाह की अनुमति प्रदान करता है। अतएव ये अधिनियम विद्यमान हैं और इनकी प्रकृति अखिल भारतीय है और कोई भी हिंदू किसी दूसरे हिंदू, सिख या जैन से विवाह करने के लिए स्वतंत्र है। यहाँ हम जो कर रहे हैं वह सिर्फ पुराने कानूनों को फिर से अधिनियमित कर रहे हैं। डॉ. मुखर्जी ने पूछा यदि कानून हैं तो उन्हें पुनः अधिनियमित क्यों कर रहे हैं? यह मैं उन पर छोडूँगा कि यदि वे कानून हैं तो हम हिंदू संहिता में उन्हें फिर से अधिनियमित करके कौन सा अपराध कर रहे हैं?
तत्पश्चात् मैं दूसरी विशेषता, निषेध के दायरे को प्रतिबन्धित या सीमित करने पर आता हूँ। हिंदू विवाह (नियोग्यता) अधिनियम के अंदर क्या यह सत्य नहीं है कि सगोत्र या सप्रवर विवाहों को अनुमति दी गई है और इस संहिता में कुछ भी नया नहीं जोड़ा गया है? यह प्रावधान पहले से ही हिंदू विधि का अंग है। बिल्कुल ठीक-ठीक कहें तो हिंदू समाज में केवल ब्राह्मणों में ही सगोत्र विवाह निषिद्ध था। क्षत्रियों और वैश्यों के लिए गोत्र की केवल आध्यात्मिक या धार्मिक अहमियत थी। उनके लिए गोत्र का अभिप्राय यह नहीं था कि वे एक ही पूर्वज के वंशज है। केवल ब्राह्मणों के मामले में ही एक ही गोत्र से होने का अभिप्राय यह था कि वे एक ही पूर्वज के वंशज हैं। शूद्रों के मामल में सगोत्र विवाह सदैव अनुमत्य था। कानून जैसा कि यह था या जैसा कि यह है के अंतर्गत, क्या हम पाते हैं कि संगोत्र विवाह विधि और विधिमान्य थे और केवल यही इस संहिता में सम्मिलित किया जा रहा है।
दूसरा प्रस्तुत प्रतिबंध यह है कि निषेध का दायरा सीमित किया जा रहा है, पितृ पक्ष के मामले में पाँच और मातृ पक्ष के मामले में तीन पीढि़याँ। जहाँ तक हिंदू विधि और इस देश में प्रचलित रीति-रिवाज और प्रथाओं का संबंध है इसमें एकरूपता नहीं है। कई टीकाकारों ने सात और पाँच निषेधों की वकालत की है; दूसरों ने पाँच और तीन निषेधों की हिमायत की है। उन्होंने सोचा कि पाँच और तीन निषेधों से आगे जाना आवश्यक नहीं था। यजुर्वेद में यह प्रतिबन्ध तीन और दो हैं और कतिपय वैदिक ग्रंथां में यह दो से अधिक नहीं है। इस विधेयक में मेरा यह विचार है कि हम सिर्फ पुरानी व्यवस्था की ओर लौट रहे हैं, वह हिंदू विधि जो कि आरम्भ में दूसरों के सम्पर्क से प्रदूषित होने से पहले थी।
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एकल विवाह प्रथा के संबंध में आज प्रचलित हिंदू विधि के अंतर्गत हिंदू स्त्री का सिर्फ एक पति हो सकता है।