236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री कामथ : एक जीवित पति।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : जीवित, या मृतक भी।
श्री कामथ : एक-एक मृत या एक जीवित ही हो।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : कुछ मामलों मे केवल एक, जीवित या मृत।
जहाँ तक पुरुषों का संबंध है, एक गलत धारणा है कि हिंदू विधि बहु-विवाह की अनुमति देता है। किंतु याज्ञवल्क्य, मनु और आपस्तम्भ के कतिपय ग्रंथों में मैं पाता हूँ कि उनमें यह विधान किया गया है और निर्धारित किया गया है कि कतिपय सुपरिभाषित परिस्थितियों में एक हिंदू दूसरी पत्नी रख सकता है। जब सदन के सम्मुख संगत खंड आता है तब श्लोक और पाठों का उदाहरण दूँगा।
श्री पंडित मालवीय : क्या आप उसका सुझाव देते हैं।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : मैं नहीं। बम्बई और मद्रास ने अभी विधान पारित करके निर्धारित किया है कि एक विवाह प्रथा होगी। विशेष विवाह अधिनियम और नागरिक विवाह अधिनियम में हिंदुओं के लिए एक विवाह प्रथा के इस सिद्धांत को मान्यता प्रदान किया गया है। मैं यह पाता हूँ कि इस सिद्धांत को विवाहित स्त्रियाँ (अलग निवास और भरण-पोषण) अधिनियम जो यह मान्यता प्रदान करता है कि यदि पति दूसरी स्त्री या रखैल रख लेता है तो विवाहित स्त्री अलग निवास और भरण-पोषण पा सकती है, के द्वारा भी अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता प्रदान की गई है कि एक पत्नी के प्रति दृढ़ रहना हितकारी है। इससे किसी भी प्रकार का विचलन बुरा है। तथा उस स्थिति में एक स्त्री को अलग निवास तथा भरण-पोषण के अधिकार की अनुमति है।
श्री कामथ : बहुविवाह के बारे में क्या है?
श्री बी. के. पी. सिन्हा : तब मैं दूसरे सिद्धांत तलाक पर आता हूँ। डॉ. मुखर्जी काफी क्रुद्ध थे; उन्होंने कहा कि हिंदू विवाह सांस्कारिक, अविच्छेद्य और स्थिर है। कोई व्यक्ति किसी स्त्री से विवाह करने में एक बार गलती कर देता है तो उसे ठीक करने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन मैंने कुछ प्राचीन ग्रंथों में देखा है कि हिंदू विवाह उतना स्थिर और उतना अविच्छेद्य नहीं था जितना डॉ. मुखर्जी दावा करेंगे। मैं एक पढ़ कर सुनाऊँगा जो हमें बताता है कि स्त्रियों को भी दूसरा पति स्वीकार करने का अधिकार था। यह पाठ नारद और पाराशर का हैः-
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नष्टे मृते प्रबजिते क्लीबे च पतिते पत्यौ।
पञ्चस्वापत्सृ नारीगां पतिरन्यो विधीयते।।
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