238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करना पड़ा। हमें विकास और प्रगति का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। हमें उस स्थिति को देखना चाहिए जहाँ समाज पहुँच चुका है। हम एक ऐसे युग में नहीं रह रहे हैं जब भारत का बाहरी दुनिया से कोई सम्पर्क नहीं है। हम ऐसे युग में रह रहे हैं जिसमें विचारों को देश की सीमाएँ लाँघने की निपुणता है। हम उस युग में रह रहे हैं जिसमें पुरुषों और स्त्रियों, खासकर नवयुवकों और नवयुवतियों के मन में स्वाधीनता और स्वतंत्रता के कतिपय सिद्धांत घुस गए हैं और यदि हम उन विचारों को व्यापक करने का अवसर नहीं देंगे तो मुझे भय है कि हिंदू समाज जिसे आज हम जैसा जानते हैं वह अपने अस्तित्व को लम्बे समय तक बनाए रखने में समर्थ नहीं हो सकेगा।
फिर मेरे कुछ मित्रों ने आग्रह किया कि प्रान्तीय कानून हैं ही और हमें इस विषय को प्रान्तीय सरकारों पर क्यों नहीं छोड़ देना चाहिए। बिल्कुल यही कारण है कि मैं क्यों यह कह रहा हूँ कि हमारे पास केन्द्रीय विधि होनी चाहिए। विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, उत्तराधिकार और विरासत समवर्ती सूची की मद संख्या 5 के अंग हैं। कोई भी राज्य विधानमंडल इन विषयों में से किसी पर भी विधान बनाने के लिए स्वतंत्र है, और कुछ राज्यों ने ऐसा किया भी है। मान लीजिए हम विधान नहीं बनाते हैं इसके परिणाम क्या होंगे? परिणाम यह होगा कि प्रथा, जिसके लिए डॉ. मुखर्जी ने इतने आँसू बहाए, सभी अलग-अलग प्रान्तों में प्रान्तीय विधायन के द्वारा रद्द कर दिए जाएंगे और तब सभी प्रान्तों में एक दूसरे से भिन्न सांविधिक विधियाँ होंगी। यदि प्रगति और विकास की एक मात्र वाहक प्रथा है तो यह वाहक नष्ट हो जाएगा और विधि बिल्कुल पृथक-पृथक हो जाएंगी - 26 या 30 विधियाँ, वास्तव में उतनी ही विधियाँ हो जाएंगी जितने कि प्रान्त या राज्य भारत में हैं। मैं यह सोच कर काँप उठता हूँ कि हिंदू समाज और अंततः राष्ट्र की शक्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, एक स्थिर और समरस समाज के लिए शक्तिशाली और स्थिर राष्ट्र एवं महत्वपूर्ण उपादान है।
फिर अन्तरजातीय विवाह का सवाल है। पहले के समय में एक क्षेत्र के लोगों का जन्म उसी क्षेत्र में होता था उसी क्षेत्र में वे बढ़ते थे और वे अपने ही क्षेत्र में मरते भी थे। वे उस क्षेत्र की प्रथाओं और रीति-रिवाजों से शासित होते थे। आज हम क्या देखते हैं? इस संसद में, इस संसद की दर्शक दीर्घा में देश के सभी भागों के सदस्य हैं।
श्री कामथ : व्यवस्था का प्रश्न है - क्या दर्शक-दीर्घा का उल्लेख किया जा
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सकता है?
श्री बी. के. पी. सिन्हा : मैं दर्शक दीर्घा को सम्बोधित नहीं कर रहा हूँ। यदि