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मैं देश की बात कर सकता हूँ तो उसी तरह से मैं दर्शक दीर्घा की बात भी कर सकता हूँ।
देश के विभिन्न हिस्सों के निवासी यहाँ एकत्रित हैं। न केवल इस शहर में, अपितु इस देश के प्रत्येक प्रमुख शहर में आप अलग-अलग प्रान्तों क लोगों को पाते हैं - आप कलकत्ता से त्रावणकोर का आदमी पाते हैं, त्रावणकोर में आप बिहार और कलकत्ता का आदमी पाते हैं।
बहुधा, अलग-अलग प्रान्तों के निवासी, प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों और कट्टरपंथियों की भावनाओं के द्वारा लगाए गए प्रतिबन्धों के बावजूद भी वैवाहिक संविदा के द्वारा एक साथ आने का रास्ता खोज ही लेते हैं। उन पर और उनकी संतति पर क्या प्रभाव पड़ेगा यदि हम इन विभिन्न प्रान्तीय विधियों को चलने देते हैं। मान लीजिए बम्बई का एक आदमी बिहार में एक विवाह प्रथा कानून है। बिहार में उसके विवाह का क्या होगा। बिहार की पत्नी से उसके सन्तान जहाँ बिहार में वैध होंगे, जब वे बम्बई जाएंगे तो वे अविधिमान्य माने जाएंगे और उन्हें कोई भी नागरिक अधिकार नहीं होंगे। अलग-अलग जातियों और अलग-अलग प्रान्तों के सैकड़ों दम्पत्तियों का क्या होगा? उन सन्तानों के क्या अधिकार होंगे? यदि आप व्यक्तिगत तौर पर विकल्प चुनने देंगे तो कई प्रकार के अनियमितताओं के उभरने की संभावना है। एक व्यक्ति नई संहिता का विकल्प चुन सकता है; उसका पिता प्राचीन हिंदू विधि से शासित हो सकता है; और चुनने वाले का पुत्र नई संहिता को स्वीकार नहीं भी कर सकता है। ऐसे परिवार पर कौन-सी विधि लागू होगी? इसलिए, यदि मेरे माननीय मित्रों के सुझाव को मान लिया जाता है तो इससे इतना ज्यादा भ्रम उत्पन्न होगा जितना कि बैबेल की मीनार में भी नहीं हुआ था। न्यायाधीशों को इस भ्रम को दूर करने में सदियां लग जाएंगी। अतएव, मैं मानता हूँ कि हम उस स्थिति में पहुँच चुके हैं जहाँ हिंदू समाज के हित में हमें इस तरह की विधि को अपनाना ही होगा।
पहले प्रान्तों में इतनी दृढ़ता थी कि एक विशेष प्रान्त में रहने वाले लोगों की सामाजिक परम्परा एक होती थी। एक ही जाति के लोगों का लगभग समान बौद्धिक विकास होता था, एक ही सांस्कृतिक संहिता होती थी, इत्यादि। उन परिस्थितियों में, जब कोई अपनी जाति के बाहर विवाह करता था तो वह बिल्कुल दूसरी ही दुनिया में चला जाता था। किंतु आज ये सांस्कृतिक, आर्थिक और बौद्धिक विषमताएं विलुप्त होती जा रही हैं। भारत में समाज समरस बनता जा रहा है। जबकि पहले अपनी ही जाति या प्रान्त के अंदर ही विवाह करने का कुछ औचित्य था आज ऐसा कोई औचित्य नहीं है क्योंकि विभिन्न समुदायों का बौद्धिक स्तर और आर्थिक स्तर परस्पर एक ही धरातल पर आते जा रहे हैं।