240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पहले की परिस्थितियों में अपनी जाति से बाहर विवाह करना सुप्रजननीय सिद्धांतों के अनुसार बुरा माना जाता होगा। आज सुप्रजननीयता के नियम बिल्कुल भिन्न दिशा में निर्दिष्ट करते हैं। वे उस दिशा की ओर निर्दिष्ट करते हैं जिस ओर इस विधेयक के माननीय प्रस्तावक हमें ले जाना चाहते हैं।
डॉ. मुखर्जी ने इस संहिता के विरुद्ध इस देश में लोगों की भावनाओं की तीव्रता और प्रसार के बारे में उल्लेख किया। मैं एक ग्रामवासी हूँ। मैं उन विकसित शहरों में से किसी से भी नहीं आता हूँ जहाँ अधिकाँश आधुनिक सिद्धांत सामान्य तौर पर प्रचलित हैं। मैं इस विषय पर ग्रामवासियों के विचार को जानता हूँ। मैं जानता हूँ कि इस संहिता के संबंध में उनके मन में कई गलत धारणाएँ हैं। ऐसा इसलिए कि इस संहिता के विरोधी पिछले पाँच वर्षों या लगभग इतने ही समय से इसके विरुद्ध उग्र अनाप-शनाप प्रचार चला रहे हैं जबकि इस विधेयक के समर्थक चुप्पी साधे हैं। मेरे क्षेत्र में भी लोगों ने कुल मिलाकर इस विधेयक के प्रावधानों के विरुद्ध थे। किंतु जब मैंने उन्हें इस विधेयक के प्रावधानों को विस्तार से समझाया, मैं आपको कह सकता हूँ कि उनमें से कम से कम 70 प्रतिशत ने अपना विचार बदल दिया तथा इस बात को समझ गए कि इस समाज के लिए इससे कम किसी भी विधान की जरूरत नहीं है। जब डॉ. मुखर्जी संवेदना की तीव्रता के बारे में कहते हैं तो मैं यह स्वीकार करता हूँ। किंतु जब वे इस संवेदना गहराई और विस्तार की बात करते है तो मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। इसमें कोई गहराई नहीं है क्योंकि यह संवदेना अज्ञानता पर आधारित है। इसका कोई विस्तार नहीं है क्योंकि कुल मिलाकर लोग इस संहिता के विरुद्ध नहीं हैं। केवल गिने-चुने धनाढ्य लोग जो अपनी संपत्ति, अपनी जमीन, अपने अंश का ज्यादा ध्यान रखते हैं, इस विधान के विरुद्ध इतना शोर मचा रहे हैं। इन कट्टरपंथी लोगों में से कुछ के साथ मेरी अंतरंग बातचीत हुई थी। उन्हें हिंदू विधि या हिंदू सिद्धांतों या ऋषियों या स्मृतियों का रत्ती भर भी सूक्ष्मतम कण के बराबर भी ख्याल नहीं है। वे जिस कारण से विरोध कर रहे हैं वह संपत्ति संबंधी खंड है।
श्री आर. के. चौधरी : अब उसका परित्याग कर दिया गया है।
डॉ. देशमुख (मध्यप्रदेश) : किंतु पत्नी भी संपत्ति है।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : मेरा तर्क इन तीन पंक्तियों का है। इसमें कुछ भी क्राँतिकारी नहीं है। वह सब कुछ जो हम पाने जा रहे हैं वह पहले से ही कानून के ग्रंथ में विद्यमान है। दूसरी बात यह है कि यह विधेयक हिंदू धर्म के मौलिक सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं जाता है। अपितु, यह एक चक्र को पूरा करना चाहता है। चक्र पूरी तरह से घूम चुका है और हिंदू विधि की पुरातन पवित्रता पुनःस्थापित की जा रही