241
है। तीसरी बात यह है कि आज की परिस्थितियों में हिंदू समाज के अस्तित्व के लिए यह कानून अनिवार्य है।
चूँकि मेरे बिहार के एक मित्र, श्री श्यामनंदन सहाय ने जब पिछली बार कहा था तो उन्होंने डॉ. जयकर का उल्लेख किया था। मैं एक अत्यन्त छोटा पैराग्राफ उद्धृत करना चाहूँगा। ‘‘भारत में हिंदू लॉ’’ जो 1951 में प्रकाशित हुआ था का प्राक्कथन लिखते हुए - और प्राक्कथन 1951 में लिखा गया था - इस पहलू के बारे में डॉ. जयकर का कहना था - आमतौर पर हिंदू विधि के बारे में नहीं कहना था किंतु जिन पहलुओं को मैंने हवाला दिया है उनके बारे में कहना था। वह कहते हैं :-
‘‘लेखक ने हिंदू विधि के प्रावधानों में आज के दिन विद्यमान प्रमुख कुछ कमियों जिन्हें तत्काल दूर किए जाने की आवश्यकता है पर टिप्पणी करने में चूक नहीं की है।’’
एक माननीय सदस्य : इसका लेखक कौन है?
श्री बी. के. पी. सिन्हा : इसका लेखक दूसरा व्यक्ति है किंतु प्राक्कथन डॉ. एम. आर. जयकर ने लिखा है जो हिंदू विधि के विद्वान हैं, एक राजनीतिज्ञ नहीं।
श्री श्यामनंदन सहाय : एक राजनीतिज्ञ भी।
श्री बी. के. पी. सिन्हा : संभवतः मेरे मित्र भी श्यामनंदन सहाय ने राजनीतिज्ञ डॉ. जयकर का हवाला दिया था। मैं विद्वान डॉ. जयकर की बात कर रहा हूँ।
श्री श्यामनंदन सहाय : क्या आप यह समझते हैं कि राजनीतिज्ञ, विद्वान नहीं हैं?
श्री बी. के. पी. सिन्हा : वे हैं। और तब डॉ. जयकर अपने प्राक्कथन में आगे कहते हैंः-
‘‘वह पाते हैं कि आधुनिक युग में आने-जाने और स्थान परिवर्तन की सुविधाओं में असीम वृद्धि हुई है और समय के अनुरूप विभिन्न कारकों ने अलग-अलग प्रजातियों और धर्मों के लोगों को अलग-अलग विधि-प्रणाली द्वारा शासित क्षेत्र में एक साथ रहने को बाध्य कर दिया है। ये नए कारक स्वाभाविक रूप से मनुष्य के विधिक क्षेत्र में उनके संबंधों की समस्याओं को जटिल करने की दिशा में प्रवत्त हैं। नगरपालिका और विशुद्ध रूप से स्थानीय परिस्थितियां के समुच्चय को नियमित करने के लिए बनाए गए नियम अपर्याप्त साबित होते हैं या उस क्षेत्र में विदेशी तत्वों के घुसने और उनकी उपस्थिति से उत्पन्न वैसी समस्याओं से निपटने के लिए अनुपयुक्त
* संसदीय वाद विवाद खंड- XV भाग- II, 17 सितम्बर, 1951, पृष्ठ 2732-38