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श्री लक्ष्मणन (त्रावणकोर-कोचीन) : व्यवस्था के प्रश्न पर, क्या हम सामान्य चर्चा
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कर रहे हैं या खड 2 पर कर रहे हैं?
डा. देशमुख : जहाँ तक इस खंड पर चर्चा का सवाल है मेरी टिप्पणी वस्तुतः प्रासंगिक हैं। जो मैं बताने जा रहा था वह यह था कि यदि एक आदर्श रीति से आधुनिक समय के अनुरूप समाज का पुनर्निर्माण करने और समूचे कानून को बदलने जा रहे हैं तो वह उससे बिल्कुल भिन्न होगा जिसके लिए हम यहाँ प्रयास कर रहे हैं। यहाँ तक कि इस समय हम जो प्रयास कर रहे हैं, मैं नहीं सोचता हूँ कि हिंदू संहिता हिंदू समाज के पूर्ण पुनर्निर्माण का द्योतक है। आखिरकार हम लोग वह संहिताबद्ध करने जा रहे हैं जिनका अस्तित्व है। हालाँकि यह कुछ परिवर्तनों के साथ है। क्योंकि वर्तमान समय में और इस आधुनिक युग में, यदि हम वास्तव में आधुनिक विचारों का अनुगमन करना चाहते हैं, मैं नहीं जानता कि क्या किसी भी निजी संपत्ति की अवधारणा बहुत समय तक बनी रह पाएगी। अतएव, संपत्ति विधि पर चर्चा करने और यह वाद-विवाद करने की क्या आवश्यकता है कि क्या यह मिताक्षरा या दायभाग के अनुसार है या हम लोग ज्येष्ठाधिकार या कोई अन्य सिद्धांत शुरू करने जा रहे हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूँ कि जब तक हमारे यहाँ हिंदू विधि है जिसके द्वारा हम इस समय शासित हो रहे हैं और जब तक यह सुबोध विधि है, जिसे पूरी जनसंख्या और पूरा हिंदू समुदाय समझता है, अभी वह समय नहीं आया है जबकि हम समाज पर लागू विधि में क्राँतिकारी और आमूलचूल परिवर्तन करने का प्रयास करें। क्योंकि इससे अभी जितनी समस्याएँ विद्यमान हैं उससे कहीं ज्यादा समस्याओं के उत्पन्न होने की संभावना है। इसके साथ ही मैंने उन कठिनाइयों, परेशानियों, और उत्पीड़नों जो मौजूद हैं और जिनके कारण मानवता का कष्ट उठाने पड़ रहे हैं, को दूर करने की सदैव वकालत की है और मैं इसका पक्षधर रहा हूँ। जहाँ तक इन चीजों का संबंध है, मैं सोचता हूँ कि प्रत्येक संसद सदस्य को इस विधेयक का समर्थन करने का प्रयास करना चाहिए; जहाँ कहीं भी यह पाया गया है कि हमारी सामाजिक संरचना को क्षति होने जा रही है और जहाँ इसने अत्यधिक असुविधा और समस्या को जन्म दिया है, उन सुधारों को लिया जाना चाहिए और कट्टरपंथ से कोई भी समझौता नहीं होना चाहिए।
श्री कामथ : जबकि हम माननीय सदस्य को सुनना पसंद करेंगे। 1 बजे आधे घंटे की चर्चा शुरू की जानी थी।