246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वे प्रथा द्वारा मान्यताप्राप्त हैं तथा उनकी तलाक प्रणाली को भी प्रथाओं एवम् जाति पंचायत की मान्यता प्राप्त है। माननीय मंत्री जी चाहते हैं कि इन सभी मामलों को अत्यन्त जटिल प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। जिसमें विधि वेत्ताओं की अनिवार्यता होगी तथा अनेक प्रकार के साक्ष्य लेनें पडें़गे और ये सारी चीजें जनता के लिए कष्टदायक सिद्ध होंगी।
डॉ. अम्बेडकर : रीति सम्मत विवाह भी रहने दीजिए।
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डॉ. देशमुख : यदि इस विधेयक के प्रावधान वर्तमान में विद्यमान खामियों के निवारण तक सीमित हैं और हम उससे आगे नहीं जाएंगे, तब मैं इसका समर्थन करने को तैयार हूँ और मैं यह नहीं कहूँगा कि आप चूँकि इसे भारत में सभी लोगों पर प्रयोज्य नहीं करने जा रहे हैं अतएव इसे हिंदुओं के लिए भी प्रयोज्य नहीं करना चाहिए। मैंने उस बात को एक बहुत ही बड़े मुद्दे के रूप में उठाया था, क्योंकि मैंने महसूस किया कि यदि इसका इरादा पूरे हिंदू समाज में आमूलचूल परिवर्तनों को करने का था तो कोई कारण नहीं था कि हम इस विधान को सभी प्रावधानों को भारत में निवास कर रही संपूर्ण जनता पर प्रयोज्य क्यों नहीं बना दें। किंतु चूँकि यह एक प्रकार के सुधार के प्रयोजनार्थ है और इसका दायर विशेषकर गिने-चुने तबकों तक ही सीमित है। जहाँ तक इस दृष्टिकोण का संबंध है मुझे कोई झगड़ा नहीं है।
निःसंदेह डॉ. मुखर्जी यह कहने में काफी आगे बढ़ गए कि इसे जनता के विकल्प पर छोड़ देना चाहिए। यदि हमारे द्वारा स्वीकार किया गया पथ वह होता है तो समाज की जरूरत का सबसे आसान सुधार भी असंभव हो जाएगा। मैं नहीं जानता कि उन्होंने क्यों यह दृष्टिकोण अपनाया जबकि दूसरे मुद्दों पर वह अत्यधिक युक्तियुक्त रहे हैं। यह अपरिवर्तनवादी होने का थोड़ा सा आभास देता है। वह तलाक के प्रावधानों का समर्थन करने के लिए तैयार थे यदि एक विवाह प्रथा को भारत में निवास कर रहे सभी समुदायों के लिए प्रयोज्य बना दिया जाए। यद्यपि कि यह युक्तिसंगत प्रतीत होता है तथा यह इस संहिता को पारित कराने में मदद करने की अपेक्षा रोड़े अटकाने की चाल का आभास देता है। कम से कम मैं आमूल सुधारों तक का हिमायती हूँ जो हिंदू समाज में भ्रम को जन्म नहीं देगा। ये प्रावधान ऐसे नहीं हैं जिनसे भ्रम उत्पन्न होने की संभावना है, क्योंकि हर एक को तलाक देने या प्रावधान का लाभ उठाने की जरूरत नहीं है। असंख्य मामले हैं जिसमें पति और पत्नी दोनों दुखी हैं तथा मानते हैं कि पृथक हो जाना अच्छा होगा। वैसे मामलों के लिए हम प्रावधान बनाते हैं जिसके द्वारा विच्छेद को अनुमति दी जाएगी और मैं नहीं सोचता कि उनके बीच किसी को महज इसलिए आने की जरूरत है