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पा सकती हैं और संभवतः एक श्रेष्ठ पति भी। लेकिन एक निरक्षर महिला का क्या होने जा रहा है? यहाँ मेरी महिला मित्र अभी भी पुरुषों के प्रभुत्व और पुरुषों द्वारा जिस हद तक महिलाओं को आतंकित किया जाता है, को शिकायत करती हैं, हमारी अनपढ़ महिला का क्या होने जा रहा है जो पुरुषों की सनक और प्रभुत्व का शिकार होंगी? क्या इन शिक्षित महिलाओं ने तलाक से उत्पन्न होने वाले परिणामों पर कभी विचार किया है मसलन, संतान का पालन-पोषण और उनका संरक्षण?
अतएव, यद्यपि मैं इसके पक्ष में हूँ, मैं यह सचेत करना चाहूँगा कि किसी भी सुधार को शुरू करने या हमारी विधि के किसी खंड में परिवर्तन से उनके परिणामों का सामने आने वाले परिणाम का अत्यन्त शांति से अवश्य ही अध्ययन करना चाहिए। जब तक हम लोग वह नहीं करते हैं हम उन चीजों को करने का प्रयास करते रह जाएंगे जो बिल्कुल ही आवश्यक नहीं हो सकते। मैं समझता हूँ कि हिंदू धर्म में बहुत कुछ है, हिंदू विधि में बहुत कुछ है जो थोड़े सुधारों के बाद रखे जाने योग्य हैं। किंतु कुछ सुझावों के पीछे जो मानसिकता है वह कुछ हिंदू-विरोधी है - वे जो कुछ भी हिंदू है उसे शंका और घृणा की दृष्टि से देखते हैं। उन्होंने कहीं और किसी तरह से इस विचार को आत्मघात् कर लिया है कि भारत में जो कुछ भी विद्यमान है वह पूरी तरह सड़ चुका है और जब तक वे विदेशी राष्ट्रों का अनुसरण नहीं करते हैं और उनके विचारों को आत्मसात् नहीं करते हैं तथा उन्हें यहाँ नहीं अपनाते हैं तब तक हिंदू समाज उनके अपेक्षित मापदंड तक नहीं आएगा। मैं यह मानने को तत्पर हूँ कि वे ईमानदार प्रयोजन से प्रेरित हैं किंतु ठीक उसी समय एक अलग दृष्टिकोण भी हो सकता है जो यह सुझाव देता है कि आप मात्र अन्धानुकरण से जीवित नहीं रह सकते हैं। जीवित रहने का तरीका समय के अनुरूप बदलना होगा न कि अतिवादी की तरह हमारी विधि और समाज के मूलाधार तथा मूल तत्वों को पूर्णतया ही बदल देना। और उस दृष्टिकोण से मैं पर्याप्त सावधानी बरतने का सुझाव देता हूँ। कल जब मैंने कहा, मैंने सोचा कि इस विधेयक के इसके केवल विवाह और तलाक की धाराओं के साथ ही पारित करने का इरादा था और इस विधेयक को बाकी अंश के आने की संभावना नहीं है। किंतु अब मैं देखता हूँ इस विधेयक के समर्थकों का यह विचार नहीं है; वे अन्य भागों को छोड़ने के इच्छुक नहीं हैं। वे समय की उपलब्धता के दृष्टिकोण से केवल दो अध्यायों के अधिनियम तक सीमित रहने को तैयार हैं किंतु वे इस विधेयक के शेष अंश को छोड़ने के इच्छुक नहीं हैं। यदि यह विचार है तो मुझे भय है कि इस सभा में सदस्यों में से कई अपने विचार बदल लेंगे क्योंकि इसका अर्थ यह नहीं है कि यह समझौता इन दो अध्यायों को पारित कराने के बाद भी टिकेगा और वे संभवतः इस विधेयक के सम्पत्ति संबंधी खंडों और दूसरी धाराओं को पारित कराने पर जोर देंगे। यदि हम संहिताकरण के इतिहास पर गौर करें, तो हम पाएंगे