हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 271

256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि इस विधेयक के विरुद्ध बड़ा और महत्वपूर्ण जनमत है। बार एसोसिएशनों में से अधिकांश न केवल परिवर्तन के विरुद्ध रहे थे अपितु वे संहिताकरण के भी विरुद्ध रहे थे। इस प्रयोजन से बनाई गई समिति ने पूरे देश का दौरा कर यह पाया कि असंख्या संगठनों और व्यक्तियों ने किए जाने वाले प्रस्तावों की घोर निन्दा की। इन परिस्थितियों में, मैं समझता हूँ कि हमें यह कहना उपर्युक्त नहीं होगा कि इन दो अध्यायों को पारित करने के पश्चात् हम इस विधेयक के बाकी अंश पर भी विचार करेंगे तथा हम इसका त्याग नहीं करेंगे। इसे निश्चित तौर पर समझ लिया जाना चाहिए कि जहाँ तक इस संसद का संबंध है, हमें इस विधेयक में उपबंधित विवाह संबंधी विधियों तक ही सीमित रहना चाहिए। यह प्रश्न कि क्या सम्पत्ति संबंधी खंड पर विचार करने की कोई संभावना है या नहीं, मैं सोचता हूँ, इस सभा के कतिपय सदस्यों के समर्थन या विरोध संबंधी विचार को निर्धारित करेगी। यदि विचार यह है कि संपूर्ण संहिता को लेना चाहिए तो इसे राज्य विधानमंडलों के अनुसमर्थन पर छोड़ देना अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य होगा। इस प्रकार हम उन्हें जनमत को शिक्षित करने का पर्याप्त समय दे रहे होंगे ताकि यदि संहिता की सचमुच जरूरत है यदि हिंदू विधान में विभिन्न विषयों के परिवर्तनों की माँग के पक्ष में जनमत का महत्वपूर्ण भाग है तो संबंधित राज्य इसे स्वीकार कर सकता है। और एक राज्य द्वारा इसे स्वीकार करने तथा दूसरे राज्य के द्वारा स्वीकार नहीं करने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि यह पर्सनल लॉ का मामला है और किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को यह चयन करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे किस प्रकार की विधि पसन्द करते हैं।

मैं जबकि एक विवाह प्रथा और तलाक से संबंधित प्रावधानों का समर्थन करता हूँ और कहता हूँ कि वे पारित हों, तथापि मैं कतिपय परिवर्तनों का सुझाव देना चाहूँगा और कल मैं एक रख चुका हूँ, वह कि रीति सम्मत तलाक को जारी रहने देना चाहिए- और मुझे यह देखकर प्रसन्नता है कि इसके स्वीकार किए जाने की संभावना है, मैं सुझाव देता हूँ कि वर्तमान प्रस्तावों को केवल विवाह और तलाक संबंधी विधियों तक ही सीमित रहना चाहिए और वर्तमान के लिए इस संसद को इसके अतिरिक्त और कुछ भी अधिनियमित नहीं करना चाहिए।

* श्रीमती जयश्री (बम्बई) : मैं माननीय विधि मंत्री के द्वारा खंड 2 के उपखंड (4) को

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छोड़ने की माँग की गई है उसका समर्थन करती हूँ। उस उपखंड में कहा गया है :-

‘‘विशेष विवाह अधिनियम, 1872 (1872 का तीन)’’ किसी भी चीज के सम्मिलित होने पर भी, यह संहिता उन सभी पर प्रयोज्य होगी जिनका विवाह इस संहिता के लागू होने से पूर्व उस अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत सम्पन्न हुआ है।’’

* संसदीय वाद विवाद खंड- XV, 18 सितम्बर, 1951 पृष्ठ : 2750-54