हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 272

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मुझे प्रसन्नता है कि इस उप-खंड को छोड़ दिया गया है, क्योंकि विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत जनता को जो अधिकार प्राप्त थे वे अधिक व्यापक थे। यह भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम पर भी लागू होता है। यद्यपि कि हम हिंदू संहिता के माध्यम से सुधार लाने का प्रयास कर रहे हैं तथापि इस संहिता से विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्राप्त अधिकारों के बराबर भी अधिकार प्राप्त नहीं हो रहे हैं।

माननीय उपाध्यक्ष : विशेष विवाह अधिनियम के तहत वे दत्तक पुत्र ग्रहण नहीं कर सकते हैं। इस अधिनियम के अन्तर्गत वे ऐसा कर सकते हैं। क्या वह प्रगति नहीं है?

श्रीमती जयश्री : मैं कह रही हूँ कि उसमें विरासत के अधिकार हिंदू संहिता की अपेक्षा अधिक व्यापक हैं। अतएव, मुझे प्रसन्न्ता है कि उन्होंने इस विधेयक से इस उप-खंड को निकाल दिया है।

इस तर्क के संबंध में कि इसे एक आदर्श और सर्वव्यापी संहिता क्यों नहीं बना दिया जाए जो मुस्लिमों, पारसियों और ईसाइयों पर भी प्रयोज्य किया जा सके, मैं कहना चाहूँगी कि हमें सबसे पहले यह पता करना चाहिए कि क्या सदस्यगण इतनी दूर तक जाने को तैयार हैं। यह एक आदर्श संहिता होगी यदि हम भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और नागरिक, विवाह अधिनियम की सीमा तक ही जाएँ, क्योंकि यह स्पष्ट है कि हमारा समाज इस समय हिंदू संहिता के तहत सुधारों को स्वीकार करने और इतनी आगे तक जाने को भी तैयार नहीं हैं। अतएव, मुझे आश्चर्य है कि क्या सदस्यगण व्यापक सिद्धांतों, जो विशेष विवाह अधिनियम की बुनियाद हैं, को स्वीकार करेंगे।

कल, डॉ. मुखर्जी ने कहा था कि मुस्लिमों से भी एक विवाह प्रथा सिद्धांत को स्वीकार करने को कहा जाए। मैं कहना चाहूँगी कि मुस्लिम विधि स्त्रियों को अधिक अधिकार प्राप्त कराता है। हम लोगों के विद्यमान हिंदू विधि के अन्तर्गत महिलाओं को वे अधिकार नहीं दिए गए हैं।

माननीय उपाध्यक्ष : वह एक विवाह प्रथा के प्रश्न पर थे।

श्रीमती जयश्री : एक विवाह प्रथा और सांस्कारिक विवाह। हमारे सांस्कारिक विवाह के संबंध में विवाहित दम्पत्ति स्वतः यह करने का वचन देते हैं :-

‘‘मेरे साथ इन सात फेरों को लेकर हम सहचर बन गए हैं। मैं इस साहचर्य को बनाए रख सकूँ और उससे कभी भी अलग न होऊं न ही वह मुझसे अलग हो। हम