258 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक बने रहें। हम सदैव एक साथ परामर्श करते रहें, एक-दूसरे से प्रेम करते रहें, एक दूसरे के साहचर्य के लिए सदैव तत्पर रहें, मन एक हो और शक्ति तथा सुख में एक साथ बढ़ें। अपनी आकांक्षाओं, प्रतिज्ञाओं और दुःखों में हम एक हों।’’
क्या मैं यह पूछ सकती हूँ कि क्या सांस्कारिक विवाह का यह आदर्श और इस समय के समाज में बना हुआ है? मैं डॉ. मुखर्जी से सच्ची राय देने की गुजारिश करती हूँ कि क्या वह सच्चे तौर पर यह सोचते हैं कि क्या हमारे विद्यमान हिंदू विवाह विधि में किसी भी सुधार की जरूरत नहीं है। हम सभी जानते हैं कि हमारा हिंदू समाज एक पुरुष को जितनी ही बार वह चाहे विवाह करने की अनुमति प्रदान करता है। यह प्रतिज्ञा जो हम विवाह समारोह के दौरान लेते हैं वह सिर्फ स्त्रियों के लिए ही है। हमारे कानून एक तरफा हैं। वे केवल महिलाओं के लिए हैं। हम सभी जानते हैं कि जब एक पुरुष विधुर हो जाता है, तो जब वह शमशान घाट पर अपनी पत्नी की अन्त्येष्टी में शरीक होता है तो वहाँ भी उसकी सगाई होती है। इसलिए पुरुष विवाह को अत्यन्त ही सामान्य रूप से लेते हैं। और इस पर भी हम हिंदू विवाहों को सांस्कारिक कहते हैं।
माननीय उपाध्यक्ष : विधवा भी विवाह कर सकती हैं।
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श्रीमती जयश्री : उस मामले में स्त्रियाँ ज्यादा रूढि़वादी हैं। वे अभी भी यह
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मानती हैं कि वे विधवा हो जाने पर भी विवाह करना पसंद नहीं करेंगी। वे दूसरी शादी करना नहीं चाहती हैं, किंतु हमारी हिंदू विधि के एक-तरफा होने के कारण नारी प्रतिष्ठा में कमी आई है।
माननीय सदस्यों ने हरिजन में छपे के. मशरूवाला का लेख अवश्य पढ़ा होगा जिससे यह पता चलता है कि हम इस समय अपने समाज में स्त्रियों से कैसे व्यवहार कर रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि महाभारत में कैसे द्रोपदी का चीरहरण किया गया था और उसने कृष्ण से प्रार्थना की :
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(‘‘मैं कौरवों के सागर में डूब रही हूँ। हे कृष्ण मेरी रक्षा करो।’’)
आज हम अपनी गरीब स्त्रियों, जिनके साथ हमारा समाज दुर्व्यवहार करता है, का इसी तरह का आह्वान सुनते हैं। हम अपने हिंदू समाज को सनातन कहते हैं, जिसका अर्थ है - सदा नूतन - यह सदैव परिवर्तनशील है। परिवर्तन ही जीवन का सार है। यदि समाज में परिवर्तन नहीं होता है तो इसमें ठहराव आ जाता है। हमारा समाज हजारों वर्षों तक इसीलिए टिका रहा क्यों इसने परिवर्तनों को स्वीकार किया है।