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इस विचार पर जोर दिया गया है कि हमें तलाक का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे विवाह सांस्कारिक हैं, जैसा कि डॉ. देशमुख ने अभी-अभी कहा, पुराने जमाने से हम अपनी स्मृतियों (पाराशर और नारद) में पढ़ते हैं कि कतिपय दशाओं में तलाक स्वीकार किया जाता था। आज हिंदू संहिता में हमने विवाह की पवित्रता और दोनों पक्षों के हित को बनाए रखने का प्रयास किया है। निर्माताओं ने तलाक का चरम कदम उठाने से बचने के लिए पूर्व निवारणों और दाम्पत्य अधिकारों एवं न्यायिक विच्छेद को वापस देने की व्यवस्था की है। अतएव तलाक अत्यधिक सरल नहीं है। बड़ौदा में 1937 में तलाक अधिनियम पारित हुआ था, 1939 में किए गए विश्लेषण के अनुसार तलाक और न्यायिक विच्छेद के मामलों की संख्या 42 थी। इनमें से ग्यारह क्रूरता के कारण; दो परित्याग और क्रूरता के कारण; सात पति द्वारा परित्याग के कारण; एक पत्नी द्वारा परित्याग के कारण; छः पति की क्रूरता और आदतन मद्यपान एवं दूसरी बार विवाह के कारण हुआ था। इन घटनाओं से पता चलता है कि तलाक अत्यन्त सरल नहीं हैं। केवल विशेष परिस्थितियों में ही तलाक की स्वीकृति दी जाती थी।
हम यह भी जानते हैं कि तलाक नीची जातियों में प्रचलित है। यह संहिता केवल ऊँची जातियों में इस परिवर्तन को लाना चाहता है। कल डॉ. मुखर्जी ने ‘धर्म खतरे में’ का आह्वान किया था। मैं उनसे पूछना चाहती हूँ कि क्या पत्नी को पीटना धार्मिक माना जाता है। मद्रास के किसी एक न्यायालय में एक स्त्री ने अपने पति के द्वारा पीटे जाने का मुकदमा दायर किया था। और विद्वान न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि हिंदू विधि में पत्नी को पीटने की अनुमति है। इसलिए, क्या मैं उनसे पूछ सकती हूँ कि ऐसी क्रूर प्रथा को धार्मिक कहा जा सकता है? धर्म सदैव ईश्वर से व्यक्तिगत संसर्ग है।
‘‘ईश्वर; सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन निष्ठति’’
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(हे अर्जुन! ईश्वर का सभी जीवधारी के हृदय में वास है।)
ऐसा नहीं है किन्हीं खास कानूनों को पारित कर देने से धर्म खतरे में पड़ जाता है। जैसा मैंने कहा धर्म एक अथाह सागर की भाँति है जिसमें बार-बार परिवर्तन होते रहते हैं और हम लोगों ने इन परिवर्तनों को स्वीकार किया है। यही कारण है कि हिंदू धर्म की हमारी संरचना इतने लम्बे समय तक टिकी रह सकीं। क्या मैं हिंदू संरचना में परिवर्तनों की आवश्यकता की ओर भी आपका ध्यान दिलाऊँ। मैं कहूँगी कि इस समय हमारे कानून एक-तरफा हैं। हम अपनी स्त्रियों को कोई भी राहत नहीं देते हैं। हमारा अपना राष्ट्रीय योजना आयोग है जो वर्तमान संरचना पर योजना बनाना चाहता है। मैं कहूँगी कि सामाजिक संरचना को बदले बिना उस आधार पर