हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 275

260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

योजना बनाना जो सड़ चुका है, व्यर्थ है। इस संबंध में मैं अपने समाज में सुधार के लिए कुछ सुझाव देना चाहती हूँ। एक नियोजित समाज में स्त्री का दर्जा पुरुष के समकक्ष होना चाहिए- समान दर्जा समान अवसर और समान उत्तरदायित्व, महिला के दर्जा के नियमन का मार्ग निर्देशक सिद्धांत होगा भले ही योजना में समाज का आधार कुछ भी हो। स्त्री को सिर्फ उसके स्त्री होने के आधार पर काम के किसी भी क्षेत्र से अलग नहीं किया जाएगा। स्त्रियों द्वारा पूर्ण समान नागरिक दर्जा और सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की पूर्ववर्ती विवाह एक शर्त नहीं होगा।

क्या मैं यह पूछ सकती हूँ कि इस समय स्त्रियों की स्थिति ऐसी है कि हम विद्यमान समाज में उपयुक्त तरीके से नियोजन कर सकते हैं। पारिवारिक जीवन तथा संगठन और संपत्ति में स्त्रियों का अंश होना अत्यन्त आवश्यक है। इनको नियमित करने वाले विवाह और उत्तराधिकार संबंधी कानून भी आवश्यक हैं और यही कारण है कि मैं समझती हूँ कि जब तक हमारे विद्यमान हिंदू विधि में परिवर्तन नहीं किया जाएगा तब तक हमारे इस मौजूदा संरचना पर निर्माण करना संभव नहीं है।

वूमेन्स कान्फ्रेन्स सदैव से समान संहिता के लिए कहती रही है। हम लोग भी समान संहिता के हिमायती हैं। हम नहीं कह रहे हैं कि वे विशेष विशेषाधिकार केवल हिंदू स्त्रियों को दिए जाएं। हम सभी जानते हैं कि इस समय हमारी स्त्रियां कष्ट में हैं और पिछड़ी हुई हैं। इस दृष्टि से पारसी, ईसाई और मुस्लिम, स्त्रियां हिंदू स्त्रियों से काफी आगे हैं और यही कारण है कि इस समय हम इस हिंदू संहिता का समर्थन कर रहे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, यदि हम इस हिंदू संहिता को आदर्श रूप प्रदान करते हैं तो हमारी संहिता को स्वीकार करने में दूसरे समुदायों को भी कोई आपत्ति नहीं होगी।

डॉ. देशमुख ने कहा कि कई स्त्रियों ने इस प्रश्न पर ऑल इंडिया वूमेन्स कान्फ्रेन्स से इस्तीफा दे दिया है। इसके विपरीत मैं कहूँगी कि हमारे कान्फ्रेन्स में हम काफी शुरू से ही इन परिवर्तनों के लिए कह रहे थे और हमारे अनुरोध के कारण ही विवाह, संपत्ति में स्त्रियों का अधिकार इत्यादि से संबंधित कई विधान किए गए। बम्बई में जब बम्बई के डॉ. देशमुख विधवाओं को सम्पत्ति का अधिकार देने संबंधी विधेयक लाना चाहते थे, हमने उनसे इस विधान के बारे में शीघ्रता नहीं करने और प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया, जिससे कि इसमें पुत्रियों के लिए संपत्ति और दत्तक पुत्र ग्रहण करने और दूसरे खंडां को सम्मिलित किया जा सके। उस समय उन्होंने हम लोगों से कहा था कि वह इस विधान के लिए शीघ्रता करना चाहेंगे और कि वह दूसरे सुधार भी करेंगे। अतएव, ये सुधार काफी समय से प्रतीक्षित हैं और यह नहीं कहा जा सकता कि हमने जनता की राय नहीं ली है। यहाँ तक कि यह हिंदू