हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 276

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संहिता, जैसा कि आप जानते हैं, जनता के सम्मुख पिछले दस वर्षों से हैं और यह कहने की कोई जरूरत नहीं है कि जनता की राय का प्रभाव नहीं पड़ा। मैं समझती हूँ कि पर्याप्त जनमत का सृजन किया गया था और यह कहना बिल्कुल गलत है कि इस विधान का समर्थन कुछ स्त्रियां ही कर रही हैं। हमने विभिन्न स्थानों पर अनेक जनसभाएँ कीं और इस विधान का समर्थन पूरे भारत की स्त्रियाँ कर रही हैं। स्त्रियों की ओर से मैं इस हिंदू संहिता का हार्दिक समर्थन करती हूँ।

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निर्माण, उत्पादन और पूर्ति मंत्री (श्री गाडगिल) : मैंने पूरी एकाग्रता से अपने

माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भाषण सुना।

मुझे कहना चाहिए कि यह पूरी तरह से अनुपयोगी नहीं था। उन्होंने दो बातें कहीं जो मुझे बहुत ही अच्छी लगीं। एक था कि सामाजिक सुधार के मामले में जहाँ तक हो सके हमें जनमत का सम्मान करना चाहिए। दूसरी बात उन्होंने कही कि यह एक राजनैतिक विषय नहीं है, व्यक्तिगत रूप से कोई भी राजनीतिक दृष्टिकोण रखने के बावजूद भी इस विषय में इस देश के प्रत्येक नागरिक की रुचि है। इन दो बातों के कारण से मैं कुछ आशावादी हूँ और मुझे विश्वास है कि यदि हम इस सदन में आदान-प्रदान और समझौता के वातावरण का सृजन कर सकें तो हम एक विधान संग्रह प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकेंगे जिस पर हम व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर गर्व महसूस कर सकते हैं।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने हिंदू संस्कृति की स्तुति की है और इसे गतिशील बताया है। अपने को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की क्षमता के कारण और नई प्रवृत्तियों के प्रति संवेदनशील होने के कारण हिंदू संस्कृति टिकी रह सकी। और यह हम सब लोगों का गर्व और गौरव रहा है। आज दार्शनिक नेताओं के लिए यह ज्यादा जरूरी है कि वे विचार करें कि हम आगे और प्रगति के लिए कैसे प्रयास करेंगे और हम कैसे कानून को लोक नैतिकता के अनुरूप बनाएंगे। आधुनिक समय में पुराने तरीके प्रभावी नहीं हो सकते हैं और इसलिए यह हम लोगों के लिए आवश्यक होगा कि हम आधुनिक तरीकों को अवलम्ब लें। इस तथ्य में कुछ बुराइयाँ हैं पर कोई विवाद नहीं है; यद्यपि मैं एक नेक हिंदू हूँ और हिंदू संस्कृति की स्तुति में मैं किसी की भी बात सुनने को तैयार नहीं हूँ तथापि हमारे सामुदायिक जीवन में प्रवेश कर चुकी बुराईयों के प्रति मेरी आँखें बंद नहीं हैं। समान परिस्थिति और सामाजिक न्याय के उद्देश्यों वाले संविधान को अंगीकार करके हमने भारी उत्तरदायित्व ओढ़ लिया है। हम एक समाज का सृजन करना चाहते हैं जिसमें पूर्ण समानता हो। यदि

* संसदीय वाद विवाद, खंड- XV, भाग- II, 18 सितंबर, 1951 पृष्ठ 2754-68