हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 277

262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उद्देश्य वह है तो उसे निश्चय ही पुराने नारों को गूँजायमान बनाने के पुराने तरीकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। हम लोगों ने वयस्क मताधिकार की पद्धति को अपनाकर राजनीतिक एकता की स्थापना की है। हम सामाजिक न्याय प्राप्त करना और जहाँ तक संभव हो सके कतिपय आर्थिक संस्थाओं को स्थापित करके आर्थिक विषमताओं को दूर करना चाहते हैं। जो प्रत्येक नागरिक के व्यक्तित्व को विकास के अवसर प्रदान कर पद-दलितों के लिए जीवनयापन का बेहतर स्तर प्राप्त कर सकेगा। और मेरे विनम्र विचार में यह तभी संभव है जबकि कम से कम उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण करके एवं पर्याप्त मजदूरी के स्तर को प्राप्त करने, लाभ पर नियंत्रण करने और यदि निजी उद्यमों को आर्थिक प्रणाली में जगह देना जरूरी हुआ तो विधान बना कर इन्हें राज्य के विनियमन और नियंत्रण में करके किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में हम विधायन के द्वारा सामाजिक न्याय हासिल करना तथा आर्थिक असमानता को दूर करना चाहते हैं। यदि विधायन के द्वारा हमने राजनीतिक समानता प्राप्त की है। यदि विधायन के द्वारा हम आर्थिक समानता हासिल करने या कम से कम आर्थिक असमानता को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं तो इसी प्रक्रिया अर्थात् विधायन के द्वारा सामाजिक समानता प्राप्त करने का हमारा प्रयास निश्चित तौर पर युक्तिसंगत है।

मेरे मित्र श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कहा कि हिंदू विधि को संहिताबद्ध करके आप हिंदू विधि के उन स्रोतों को सर्वथा बंद कर देंगे जो चिरकाल से काम कर रहे हैं और जिसने अभी तक प्रगति के साधनों को निरापद बना रखा है। मैं सहमत हूँ कि हिंदू विधि के स्रोत स्मृति, श्रुति, सदाचार और एक व्यक्ति की अपनी अन्तरात्मा है। वह सब कुछ सत्य है। किंतु वह सब कुछ अच्छा और बिल्कुल वैध था जब तक कि देश का राजनीतिक संविधान या राजनीतिक व्यवस्था उससे भिन्न थी जो आज है। पश्चिम में भी यह माना जाता था कि कानून में परिवर्तन विधायन के द्वारा किया जा सकता है या रूढि़तः स्वीकृत असत्य विधि के द्वारा भी हो सकता है अर्थात् कानून प्रत्यक्ष तौर पर तो वैसा ही रहता है किंतु व्यवहार में प्रथा के द्वारा इसमें परिवर्तन हो जाता है। पश्चिम में भी आधुनिक प्रवृत्ति आवश्यक परिवर्तनों को लाने हेतु मुख्यतः या तत्वतः विधायन पर निर्भर करने की आधुनिक प्रवृत्ति का विकास है। जिससे कि कानून लोक नैतिकता के अनुरूप बनेगा। कानून सदैव ही लोक नैतिकता का अनुसरण करता है। जनमत आगे बढ़ता है और प्रगति करता है क्योंकि समुदाय में यही जीवन है, जड़ या गतिहीन न होकर यह निरन्तर प्रगति करता है, निरन्तर बढ़ता है क्योंकि यही जीवन का नियम है। अतएव विधायन पीछे से आता है। किंतु इन दोनों के बीच इतना बड़ा अन्तराल नहीं होना चाहिए जो कि समुदाय की खुशियों को ही खतरे में डाल दे। अतएव प्रत्येक विवेकशील नागरिक