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प्रत्येक व्यक्ति जो समुदाय के हित के लिए चिन्तित है का यह देखना कर्त्तव्य है कि इन दोनों के बीच जितना संभव हो सके उतना ही कम अन्तराल हो।
अब दूसरी पद्धति अर्थात् रूढि़गत स्वीकृत असत्य विधिक पर सदैव निर्भर करना और न्यायपालिका को सरल शब्दों के अर्थ की व्याख्या करने की अनुमति प्रदान करना तथा उन्हें समुदाय में विद्यमान विचारों के अनुरूप कानून को बनाने का प्रयास करने के लिए कहना कदापि ठीक नहीं होगा।
मुझे कहना चाहिए कि तीसरी पद्धति अर्थात् प्रथा आधुनिक परिस्थितियों के उपयुक्त नहीं है। आखिरकार और उपयुक्त है तथा जो समुदाय के अत्युत्तम हित में है को प्रवर्त्तित करने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं था। अब, आधुनिक विश्व में कानून के ऊपर प्रथा के प्रचलित होने की बात करना एक प्रकार की विसंगति है। यदि प्रथा उतने व्यापक स्तर पर प्रचलित है तो मुझे थोड़ा भी संदेह नहीं है कि विधायक विधान शुरू करेंगे तथा प्रथा को विधि के शासन मे सम्मिलित कर गौरवपूर्ण स्थान दिया जाएगा।
उसके ऐसा होने पर मैं अपने माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के तर्क को समझने में असमर्थ हूँ कि हम कुछ इन्कलाबी करने जा रहे हैं और इस रीति से विधि के सहज स्रोत जो उपलब्ध थे पूरी तरह से बंद हो जाएंगे। ऐसा नहीं है। हमें उत्तराधिकार में जो कुछ भी मिला है हमें कहने के लिए वैसा ही है, अपनी विरासत को कई बैंकों में रखने की बजाए इन्हें संचयित करना और रिजर्व बैंक की ही तरह साख और मजबूती वाले किसी बैंक अर्थात् विधान में रखना चाहिए। हमने ठीक वही किया है। वस्तुतः इस संहिता, जिस रूप में अभी यह सदन के सम्मुख है, में वास्तव में जो किया गया है वह यह है कि हम जो विद्यमान काननू है - अस्सी प्रतिशत तक का व्यावहारिक रूप में समन्वय कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कुछ सीमा तक प्रगति का तत्व है। मैं यह भी स्वीकार करूँगा कि कुछ तत्व हैं जो कुछ सीमा तक जनमत से भी आगे तक जाते हैं। किंतु मैं इस सभा के सदस्यों से एक प्रश्न करना चाहता हूँ। न केवल वर्तमान समय की आवश्यकताओं के हिसाब से सोचना वरन् अपने समाज के बारे में, जिसकी हम कल्पना करते हैं या कामना करते हैं कि उसे ऐसा होना चाहिए, आगे से सोचना हमारा कर्त्तव्य है या हमारा कर्त्तव्य नहीं है? यदि नियोजन आर्थिक क्षेत्र में सामाजिक क्षेत्र में बुरा क्यों होना चाहिए? हमें चिन्ता है कि हमारे समाज का वैसा होना चाहिए। यदि आदर्श वह है जिस पर हम सहमत हुए हैं या हमारे सहमत होने का अनुमान है - क्योंकि इसे हमने अपने संविधान में एक उद्देश्य के रूप में ग्रहण किया है - तो हमें इस पर विचार करना है कि हम अपने समाज के उस गन्तव्य तक कैसे ले जाएंगे। क्या इस क्षेत्र में हम