हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 279

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हस्तक्षेप नहीं करने की नीति का अनुसरण कर सकते हैं या हम, अपने लक्ष्य के बारे में आगे की सोचेंगे या पहले से सोचेंगे और क्रमशः विधि के तंत्र से जो समयान्तर में सामुदायिक जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है और नियम समय के अनुसार गन्तव्य पर पहुँच जाता है?

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श्री गाडगिल : यदि हम इसे गैर-सरकारी प्रयास पर छोड़ दें तो मुझे कोई

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शक नहीं कि समय के बीतने के साथ हो सकता है इसमें दो पीढि़याँ भी लग जाएं, स्थितियाँ वैसी ही बनेंगी जैसी कि हम अभी चाहते हैं। किंतु उस समय तक जनमत और अधिक अधुनातन होगा। दूसरे शब्दों में हम कभी भी परिष्कृत होते हुए जनमत और विधायन के बीच से समय के तत्व को कम नहीं कर सकते हैं। अतएव मैं यह कहता हूँ कि यदि इस संहिता में अधुनातन सोच का कोई तत्व है तो यह औचित्यपूर्ण है और मैं कहूँगा कि यह बुद्धिमता का कार्य है।

अब विभिन्न दृष्टिकोण से इस विधेयक के विरोध पर आएं। कुछ लोग हैं जो इन मामलों में विधायिका के हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते हैं। ऐसे लोग हैं जो सोचते हैं कि इस देश के संसद या विधानमंडल को हस्तक्षेप करने का अधिकार है किंतु इस संसद को नहीं। वह ये पसंद करते हैं कि इस संसद के विघटन के बाद जो लोग आएंगे उनके द्वारा इस मामले को देखा और वाद-विवाद किया जाएगा। जहाँ तक पहले सम्प्रदाय का संबंध है मैं सोचता हूँ जैसा कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ठीक ही कहा था इसमें काफी विलम्ब हो चुका है। विगत 150 वर्षों के दौरान केन्द्रीय विधायिका के द्वारा निरन्तर एक विधान के बाद दूसरा विधान पारित किया गया है- भले ही उन विधानों का नाम कुछ भी रहा हो - और वे सभी विधान हिंदू समुदाय और इसके जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। जब मैंने कहा कि इस संहिता के पारित होने के शीघ्र बाद वही बात होगी पर मेरे माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सहमत नहीं थे। उन्होंने हम लोगों पर अर्थात् सरकारी पक्ष पर ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ से पीडि़त होने का आरोप लगाया है। मुझे कहना चाहिए, जैसा कि मैं सामाजिक सुधार पर उनके दृष्टिकोण से अवगत हूँ, जैसा कि मैं जानता हूँ कि वह ऐसे प्रान्त बंगाल के रहने वाले हैं जहाँ समाज सुधार सबसे पहले प्रस्फुटित हुआ जो राजाराम मोहन राय के साथ शुरू हुआ और केशव चन्द्र सेन, टैगार और अन्य महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा आगे बढ़ाया गया, कि मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि वह हिंदू संहिता में जो कुछ प्रस्तावित है उसके घोर विरोधी हैं अपितु संभवतः वह ‘चुनाव’ से व्यथित हैं, और यदि ऐसा है तो आम चुनाव में इसका उपचार और निराकरण प्रस्तुत किया जाएगा। वह सहमत थे कि यह कहना अत्यन्त कठिन है