हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 281

266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेकर आम चुनावों के बाद नए सदन के अस्तित्व में आने तक शासन करने का कोई अधिकार नहीं है।

पंडित मैत्रा : वह किसी का मामला नहीं है।

श्री गाडगिल : मैं प्रसन्न हूँ। आखिरकार कार्य करने का प्रयास किया गया है? जैसा कि मैंने कहा अस्सी प्रतिशत केन्द्रीय विधानमंडल के द्वारा पारित या राज्य विधानमंडल के द्वारा पारित विद्यमान संविधियों का संग्रह मात्र है। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने धार्मिक विवाह के बारे में खूब कहा था। मैं नहीं समझता कि यह संहिता इसे रोकती है। दुष्यन्त-शकुन्तला प्रकार के विवाह से लेकर पृथ्वीराज : संयोगिता प्रकार के विवाह तक अर्थात् गन्धर्व से राक्षस प्रकार के विवाह तक की पूरी स्वतंत्रता है और इस सभा के किसी भी सदस्य तथा बाहर की जनता को सभी आठों तरह से विवाह करने की स्वतंत्रता है। यह संहिता प्रेम करने से मना नहीं करती है, यह माता-पिता की सहमति के बिना भी वधू की सहमति से उसके साथ सहपलायन को नहीं रोकती है। जहाँ तक हिंदू सांस्कारिक विवाह के आठों प्रकार का संबंध है उन्हें तनिक भी नहीं छेड़ा गया है। क्या शिकायत है? क्या यह शिकायत इसलिए है कि ‘‘सांस्कारिक’’ शब्द को ‘‘धार्मिक’’ शब्द से बदल दिया गया है? इसे इसलिए बदला गया कि हम सभी ऐसा चाहते थे; इससे कोई अर्थ नहीं निकलता है। इसलिए हमने कहा, हमें धार्मिक शब्द लेना चाहिए जो कि उपयुक्त बैठेगा और इससे कुछ अर्थ निकलेगा, और यही कारण है कि ‘धार्मिक’ का प्रयोग किया गया।

एक माननीय सदस्य : यह गलत नाम है।

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श्री गाडगिल : मेरे माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिंदू ‘विवाह’ की अवधारणा पर खूब बोले। वह उदात्त भावनाएं व्यक्तिगत रूप से मेरी भी हैं। विवाह मात्र शारीरिक सबधों से कुछ अधिक है। यह सहभागिता है; यह आध्यात्मिक उन्नति का संयुक्त, उद्यम है, ऐसा कहा जाए कि यह विश्वासों और संवेदनाओं का संरक्षक है जिसे विश्व की किसी भी भाषा में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह एक उदात्त अवधारणा है; मैं इससे सहमत हूँ किन्तु ठीक इसी समय यह भी होता है कि कभी-कभी एक आदर्श पथभ्रष्ट हो जाता है। हम पाते हैं कि एक प्रगतिशील समाज में ऐसी घटनाएं होती हैं जिन पर समाज के नेताओं और विचारकों का ध्यान जाता ही है। मैं आज, खास कर पश्चिम के साथ हमारे संबंध के कारण, हमें कतिपय मामलों में किसी न किसी प्रकार से स्वीकार करना होगा, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हमारी संस्कृति हीन है, इसका तात्पर्य मात्र इतना है कि यह हमारे लिए सुधार के वास्ते चुनौती है। हमने स्वीकार करने की क्षमता पाई है, हमें सक्रिय होना था और इसलिए, मेरे माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जिन कानूनों का उल्लेख