हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 282

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किया वे बिल्कुल न्यायसंगत थे।

एक समुदाय के पुरुष और दूसरे समुदाय की स्त्री के बीच विवाह को रोकना क्या है? क्या यह आधुनिक युग में, वर्ष 1951 में समुचित प्रतीत होता है? क्या यह समुचित लगता है कि किसी व्यक्ति को सदैव गांव की सीमाओं के बाहर रहना चाहिए क्योंकि उसने किसी खास समुदाय में जन्म लिया है? क्या यह समुचित लगता है कि आज पद-दलित जाति का कोई व्यक्ति अपनी योग्यता के बल पर अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेता है और आज वह अत्यन्त विद्वान है, उसे दूसरी जाति के वैसे ही व्यक्ति के बराबर, दर्जा, सामाजिक आदर, सामाजिक अभिनन्दन नहीं मिलना चाहिए? क्या वर्ण का निर्धारण गुण को ध्यान में रखे बिना ही किया जाना चाहिए या इसका निर्धारण गुण को ध्यान में रखे बिना ही किया जाना चाहिए या इसका निर्धारण गुण के संदर्भ में होना चाहिए? यह आपकी समानता की भावना को चुनौती है। यदि प्रतिलोम विवाह के विरुद्ध पुराने प्रतिबंधों को सर्वथा तोड़ दिया जाए तो आपको इसका स्वागत करना चाहिए। जो प्रयास किया जा रहा है वह बिल्कुल यही है। इस प्रकार के भेद क्यों होने चाहिए? यदि विवाह मुक्त चयन का विषय है तो इसमें कानूनी अड़चन क्यों होनी चाहिए? एक तबका या एक समुदाय के पुरुष को दूसरे तबके या दूसरे समुदाय की स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए? मानव-निर्मित इन सभी अड़चनों को दूर करना होगा। मुझे ऐसा कोई भी मामला स्मरण नहीं है जिसमें ब्राह्मण का पुत्र वेद को लिए हुए, क्षत्रिय का पुत्र तलवार के साथ या हरिजन का पुत्र झाडू लिए हुए पैदा हुआ था। जन्म के समय वे एक समान थे और मृत्यु के समय भी। इन दोनों के बीच, यह देखना समाज और राज्य का कर्तव्य है कि समानता का सा वातावरण रहे। कोई भी व्यक्ति जो इसके विरुद्ध तर्क देता है वह मानवता के विरुद्ध तर्क देता है, उन सिद्धांतों के विरुद्ध तर्क देता है जो मानव बनाते हैं। आत्मसम्मान के विरुद्ध तर्क देता है। यहाँ क्या किया जा रहा है? हमारी पुरानी परम्पराओ के विपरीत कोई भी प्रयास नहीं किया जा रहा है। इसके विपरीत, मेरे मित्र और मेरे सहकर्मी डॉ. अम्बेडकर पर मेरा यह आरोप है कि जैसे-जैसे वह वृद्ध होते जा रहे हैं वैसे-वैसे वह सामाजिक सुधार के प्रति कम उत्साही होते जा रहे हैं। दस वर्ष पहले मैं सोचता हूँ उनकी भाषा अत्यन्त उग्र होती; आज वह संयम की प्रतिमूर्ति हैं। एक दिन उन्होंने कहा था, ‘‘कुछ यहाँ परिवर्तन करके, कुछ वहाँ काट-छाँट करके, और कुछ जोड़कर या घटाकर किसी भी तरह से इस हिंदू संहिता को पारित कराना है। क्योंकि इसे समस्या का समाधान करने में वर्तमान पीढ़ी का कम से कम एक नेक प्रयास समझा जाएगा।’’ वह इतना चिन्तित हैं वह समझौता करने को तैयार होने की मनःस्थिति में भी हैं। अतएव जो सदस्यगण इसका विरोध करने के लिए तत्पर हैं उनसे यह देखने का अनुरोध करूँगा कि क्या स्थिति ऐसी नहीं है जिसका हमें लाभ उठाना चाहिए। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि वयस्क