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तीन माताओं के होने वाली कठिनाइयों के बारे में जानते थे अतएव उन्होंने फैसला किया कि उनके पुत्र को सिर्फ एक होना चाहिए। इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि कैसे प्रगति होती है।
एक माननीय सदस्य : क्या उस समय तलाक था?
श्री गाडगिल : वह प्रथा थी।
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(जब पति लापता हो जाता है, मर जाता है, अन्यत्र चला जाता है, नपुंसक हो जाता है या नैतिक अधोपतन हो जाता है तब दूसरे की अनुमति है।)
यह इसे प्रमामणित करता है।
डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का यह तर्क था कि यदि यह अच्छा है तो इसे मुस्लिम समुदाय पर भी प्रयोज्य बनाया जाना चाहिए। मुझे संदेह नहीं है कि यह सरकार या आम चुनावों के बाद सत्ता में आने वाली सरकार इस तरह का विधान बनाने से नहीं झिझकेगी, जिसमें इस खास कानून को धर्म की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति पर प्रयोज्य बनाया जाएगा। कुछ माननीय सदस्यगण : अभी क्यों नहीं?
श्री गाडगिल : वस्तुत, मैं जानता हूँ कि बम्बई में जब एक विवाह प्रथा विधेयक पर चर्चा चल रही थी तो बम्बई विधानसभा में कई सदस्यों ने उसी तरह की आलोचना की थी जिस तरह की डॉ. मुखर्जी ने कल की थी। मुझे स्मरण है कि बम्बई सरकार ने अपने मंत्री के माध्यम से कहा कि उस प्रकार के विधेयक स्वागत योग्य हैं। किसी न किसी कारण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सोचते हैं कि यह सरकार घबरायी हुई है और यह ऐसा कुछ नहीं ला सकती जो मुस्लिम समुदाय को आहत करे। यदि इस देश के 90 प्रतिशत जनसंख्या जो हिंदू है इस विधान के प्रति सहमत है तो मैं उन्हें सिर्फ इस पर विचार करने को कहता हूँ कि क्या इससे शेष दस प्रतिशत जनसंख्या के लिए विधायन पारित करने में सरकार को सम्बल मिलेगा या नहीं? इसे स्वीकार करके आप सरकार के हाथ मजबूत करेंगे। मैं यहाँ एक उदाहरण देना चाहता हूँ जो मुझे विश्वास है आपको याद आ जाएगा। जब 1930 में पहले बाल विवाह विरोध विधेयक पर चर्चा हो रही थी, जिसमें मेरे माननीय मित्र बी. दास ने 1936 में उत्तरवर्ती संशोधन रखे थे, जब इसी हॉल में मूल विधेयक पर चर्चा हो रही थी, मिस्टर जिन्ना ने इसका समर्थन किया था, शेष मुस्लिम नेता जो यहाँ सदस्य