270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थे ने इस आधार पर इसका विरोध किया कि यह मुस्लिम समुदाय के पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप था। उनके शब्द हैं, यदि धर्म और लोक नैतिकता में अन्तर्विरोध है तो लोक नैतिकता को स्वीकार करना चाहिए, मुल्ला या कोई मुल्ला नहीं। इसे आप विधानसभा की कार्यवाही की रिपोर्ट में देख सकते हैं कि उनकी राय यह थी। यदि हम लोगों को यकीन है कि एक से अधिक पत्नी लोक नैतिकता के विरुद्ध है तो, मैं समझता हूँ, हमें एक विवाह प्रथा के लिए अवश्य सहमत होना चाहिए। सामाजिक क्षेत्र में अभी तक नियंत्रण का एक विवाह प्रथा पहला प्रयास है। समुदाय के श्रेष्ठ हित में, व्यक्ति की सुख के उत्तम हित में एक विवाह प्रथा का होना अत्यन्त आवश्यक है, और मुझे इसमें तनिक भी शंका नहीं है कि मुस्लिम समुदाय के प्रगतिवादी तत्व इसे तत्परता से स्वीकार नहीं करेंगे। यदि गैर-प्रगतिवादी इसे स्वीकार नहीं करते हैं, तो सरकार पर इसे प्रवर्त्तित करने की उतनी ही जिम्मेदारी होगी। मुझे उसके बारे में कोई शंका नहीं है और यदि मैं उस सरकार में हुआ तो निश्चिन्त हो जाइये कि मैं इसे प्रवर्त्तित करने के लिए अपना पूरा जोर लगा दूँगा। जहाँ तक मेरी व्यक्तिगत सोच का सवाल यही है। मेरा कहना है कि यदि वह अमृत है, तो चूँकि कुछ दूसरे लोगों ने इसे नहीं लिया तो क्या यह विष बन जाता है? मैं सोचता हूँ कि इस तरह से बहस करना इस सभा की प्रबुद्धता का अपमान है।
तलाक के प्रश्न पर, कोई भी यह नहीं कहता है कि प्रत्येक विवाहित दम्पत्ति को तलाक लेना चाहिए। उसी समय, यदि सामाजिक तनाव को नियंत्रित रखने का दायित्व राज्य का हो और इस तरह का वातावरण बनाने के प्रयास किये गए हों जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अधिकतम तृप्ति और सुख का अधिकार होगा, तब उस प्रकार की न्यायिक संस्थाओं या विधिक संस्थाओं के होने के अनुकूल दशाओं के निर्माण का दायत्वि राज्य का है। इस देश में अस्सी प्रतिशत या उससे भी ज्यादा रीति सम्मत तलाक को मानते हैं। वे चिन्तित नहीं हैं। किंतु पांच प्रतिशत या दस प्रतिशत में या यह प्रतिशत कुछ भी हो सकता है, वैवाहिक परिस्थितियों के कारण था या अनेक अन्य कारकों के कारण - संभवतः आधुनिक स्त्री ज्यादा प्रबुद्ध है - वह किसी कारण से समझती है कि जिस व्यक्ति के साथ उसका विवाह हुआ है उसके साथ रह पाना संभव नहीं है, तब विवाह को आजीवन सजा नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जब तक उनमें से एक नहीं मर जाता है तब तक सुख रहेगा ही नहीं। इसमें संदेह नहीं कि ऐसे मामले नगण्य हो सकते हैं किंतु इसके अपवाद हैं। अतएव, इसके लिए प्रावधान अवश्य ही होना चाहिए। आप इसे सख्त बना सकते हैं; आप इसे पश्चिम की भांति फूहड़ नहीं बना सकते हैं, किन्तु मैं स्वयं बोलता हूँ कि आप जो कानून बना रहे हैं वह सबसे अधिक कट्टरपंथी और