271
प्रतिक्रियावादी कानून हैं। स्वयं को बिल्कुल विपरीत। मैंने कहा होता कि मिजाज का मेल नहीं खाना विवाह विच्छेद का पर्याप्त आधार है। आखिरकार, तलाक के लिए प्रावधानों के अन्तर्गत क्या धारणा है? धारणा यह है कि दोनों पक्ष सुखी नहीं रह सकते। क्या उन्हें व्यभिचार या आरोपित व्यभिचार या क्रूरता या परित्याग की इस यंत्रणापूर्ण प्रक्रिया से गुजरना चाहिए? क्या विचार है? क्या उन्हें हमेशा होटल जाना चाहिए और होटल बिल इत्यादि का साहस रखना चाहिए? मैं समझता हूँ कि इसे बिल्कुल स्पष्ट और ईमानदार यथार्थ होना चाहिए कि जो एक-दूसरे से सहमत नहीं हो सकते हैं उन्हें अलग हो जाना चाहिए। इससे अधिक से अधिक सुख की प्राप्ति होगी। लोग समझते हैं कि इससे समाज समाप्त हो जाएगा। किंतु यदि यह प्रथा 90 प्रतिशत जनसंख्या में प्रचलित है और इस पर भी इन सभी पीढि़यों में समाज का विकास होता रहा है, मैं नहीं समझता कि बाकी के मात्र पांच या दस प्रतिशत लोगों पर इसे लागू करने से समाज की अखंडता छिन्न-भिन्न हो जाएगी। दूसरी ओर, इसके जो परिणाम होंगे वे सभी अच्छाई के लिए होंगे। वास्तव में विवाहों को प्रतिबंधित करने और एक ही गोत्र में विवाह नहीं करने संबंधी व्यादेशों के पीछे उपयुक्त कारण थे। ये प्रतिबन्ध संतानोत्पत्ति के दृष्टिकोण से थे। यदि उन व्यादेशों के पीछे वही कारण हैं तो यदि लड़का या लड़की जाति के बाहर विवाह करता है तो इनकी प्रयोज्यता अधिक होगी। तब प्रजाति में अधिक पुरुषत्व होगा, श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न लोग अस्तित्व में आएंगे। यह एक ऐसा विषय है जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना चाहिए। यह समय या अवसर प्रश्न के इस पहलू पर लंबा बहस करने का नहीं है। मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि सपिण्डों या सगोत्रों के बीच विवाह पर लगाए गए इन व्यादेशों के पीछे संतानोत्पत्ति संबंधी धारणाएँ हैं। अवश्य ही उनका पुनर्मुल्यांकन होना चाहिए।
श्री ए. सी. शुक्ल (मध्यप्रदेश) : एक वृद्ध का युवती से विवाह करना संतानोत्पत्ति
| ¼eè; | çn | s'k |
|---|
की दृष्टि से उचित है या नहीं?
श्री गाडगिल : एक वृद्ध व्यक्ति द्वारा युवती से विवाह करने को अवश्य रोकना चाहिए।
श्री ए. सी. शुक्ल : एक वृद्ध व्यक्ति और युवती से उत्पन्न संतान की स्थिति क्या होगी?
श्री गाडगिल : यह यथासंभव स्वस्थ होगा। प्रश्न है कि उन सभी विधियों या प्रथाओं जिन्होंने हिंदू समाज के प्रगतिशील चरित्र में रोड़ा अटकाया है को जाना होगा। डॉ. एस. पी. मुखर्जी ने ब्रह्म समाज, सनातन समाज का हवाला दिया।