272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
राजा राम मोहन राय से रानाडे, तिलक, आगरकर तक समाज सुधारकों की श्रेष्ठ परंपरा है जिन पर हमें गर्व है। किंतु यह प्रक्रिया वहीं क्यों ठहर जाती है? यदि जो कुछ पहले किया गया था वह ठीक था तो हमें प्रगति के उन्हीं सिद्धांतों का पालन करना होगा। यदि हम उसी दिशा में आगे बढ़ते हैं तो अभी आपको भयभीत क्यों होना चाहिए? आपको ऐसा क्यों सोचना चाहिए कि चूँकि मनु महान थे अतएव मनु की मृत्यु के पश्चात् आने वाली सदियों में उतना महान कोई व्यक्ति हो ही नहीं सकता? मैं समझता हूँ कि केवल जनेऊ को छोड़कर अहमद भी याज्ज्ञल्क्य के बराबर ही महान हैं जितना कि मनु या गार्गी थे। एक माननीय सदस्य : वह मनु है।
श्री गाडगिल : और मैं उतना ही अच्छा हूँ जितना कि कोई दूसरा वृद्ध नागरिक। हमें ऐसा क्यों सोचना चाहिए कि वर्तमान पीढ़ी सामाजिक पुनर्संरचना का काम नहीं कर सकती? दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में भारत एक झण्डे के तले एक अखंड इकाई नहीं हो सका था। किंतु यदि यह पीढ़ी उस काम को अंजाम दे सकती है तो क्या यह पीढ़ी सामाजिक क्षेत्र में समाज को प्रगतिशील बनाने के काबिल नहीं है? मैं उस प्रश्न का उत्तर चाहता हूँ। आप अपनी और हम लोगों की स्तुति कीजिए, कि राजनीतिक क्षेत्र में कुछ महान काम किया गया है। आप सामाजिक क्षेत्र में कुछ करने से क्यों घबरा रहे हैं? आपमें यह हीन भावना क्यों है? निःसंदेह मनु ने जो किया वह अच्छा था। किंतु :-
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‘‘तातस्य कूपोयमिति ब्रुवाणा
श्रारं जल कापुरुषाः पिवन्ति’’
(चूँकि यह कुआँ मेरे दादा के परदादा के द्वारा खोदा गया था, अतः इसके पानी के खारा होने के बावजूद मुझे इसे अवश्य पीना चाहिए। ठीक है, यह मेरा दृष्टिकोण नहीं है।)
श्री आर. के. चौधरी : तो आप अपना जनेऊ क्यों नहीं फेंक देते हैं?
श्री गाडगिल : मैं इसे फेंक चुका हूँ। यह देखिए।
पंडित मालवीय : मुझे यकीन है कि माननीय मंत्री यदाकदा इसे पहनते हैं जब उन्हें ऐसा महसूस होता है।
श्री गाडगिल : नहीं, ऐसी बात नहीं है। और चूँकि यह विषय मुझसे संबंधित है अतएव आप कृपा करके कुछ समय के लिए मुझे विस्तार में जाने की अनुमति देंगे।