274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पूरे इतिहास से यह उजागर होता है कि यह निरन्तर चरणबद्ध रूप से प्रगति करता रहा है। अन्यथा आप कैसे अनगिनत स्मृतियों जिसमें एक स्मृति ने नियम दिया है तो दूसरे स्मृति ने दूसरा नियम, का औचित्य कैसे सिद्ध करेंगे? आप इसकी व्याख्या कैसे करते हैं? समाज निरन्तर प्रगतिशील है और सदाचार या व्यवहार धर्म के लिए उपयुक्त रास्ता खोजना ही होगा। और सनातन धर्म की परिभाषा एक महान शास्त्री ने इस प्रकार से की है :-
| lu | kr | u |
|---|
| Col1 | Col2 |
|---|---|
(शाश्वत सदैव नया है।)
परिवर्तन प्रकृति का विशेष शब्द है।
परिवर्तन या विनाश। हमारा समाज प्रगतिशील है और यह एक गतिशील समाज है, जैसा कि डॉ. मुखर्जी ने कहा था और इसलिए हमें निरन्तर बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढालना होगा। निःसंदेह, इसका अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी सतत् या स्थायी नहीं है।
पंडित मैत्रा : संस्कृत साहित्य में सनातन शब्द की वैसी परिभाषा कहाँ दी गई है जैसा कि माननीय मंत्री जी ने अभी-अभी बताया है? सनातन का तात्पर्य है....
सदाभव इति सनातन : अर्थात् शाश्वत।
श्री गाडगिल : मैं सनातन शब्द के व्याकरणिक अर्थ को मानने के लिए तैयार नहीं हूँ।
श्री भट्ट : काका साहिब का अपना अभिप्राय हो सकता है।
श्री गाडगिल : उसका भी कम महत्व नहीं है। काका साहिब भी थोड़ा बहुत संस्कृत जानते हैं। बात यह है कि पूरे इतिहास में हिंदू समुदाय में प्रगति की प्रवृत्ति रही है। हमें अभी क्यों ठहरना चाहिए? आधुनिक परिस्थितियों की माँग है कि परिवर्तन विधान बनाकर किए जाएं न कि प्रथाओं के द्वारा। यदि कल किसी दूसरे चीज की जरूरत होगी तो उस समय के नेतागण विधानमंडल के माध्यम से वह परिवर्तन लागू करेंगे। मैं सहमत हूँ कि यह एक ऐसा विषय है, जिस पर धैर्य और विवेक से विचार किया जाना चाहिए? यदि हम सहमत हैं कि कतिपय बुराइयाँ हैं, तो हमें क्यों नहीं उन्हें दूर करना चाहिए? मुझे याद है कि जब मैं बाल विवाह निषेध अधिनियम के संबंध में अपने माननीय मित्र श्री बी. दास के संशोधन विधेयक पर बोल रहा था। मैंने 1931 की जनगणना से आँकड़े दिए और बताया कि एक वर्ष की आयु से कम