हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 290

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की विधवाओं की संख्या 1300 थी। क्या वह बुराई नहीं है? और दस वर्ष से कम आयु की बाल विधवाओं की संख्या लाखों में थी। और यदि आप उन्हें पुनर्विवाह से रोकते हैं तो समाज पर इसका क्या प्रभाव होगा उसके बारे में सोचिए? और जो विधायन पारित किया गया था उससे केवल भला ही हुआ है। आज स्थिति यह है कि विवाह की औसत आयु में काफी वृद्धि हुई है। अभी जो समस्या है वह जल्दी विवाह की नहीं हैं बल्कि यह नितान्त रूप से विवाह से जुड़ी हुई है।

1930 में इस विधान के विरोध का खतरा था और यह खतरा इतना अधिक था कि सभी समुदाय इस विधान के विरुद्ध गोलबंद हो गए। उस समय जो चित्रण किया गया वह मुझे याद है; इस अधिनियम के लागू होने से पहले हजारों बच्चों को कलकत्ता से चन्द्रनगर ले जाकर वहाँ विवाह कर दिया गया। क्योंकि यह ब्रिटिश भारत का अंश नहीं था, हजारों बच्चों को सिन्धु के बीचों-बीच ले जाकर वहाँ विवाह कर दिया गया क्योंकि उस समय जहाँ तक इस अधिनियम का संबंध था यह प्रदेशातीत नहीं था। मिस्टर बी. एम. दास के समुदाय पर प्रदेशातीत के इस तत्व का समावेश किया गया। कहना यह है कि निःसंदेह बुराइयां हैं जिनके बारे में कोई विवाद नहीं है और किसी की भी इच्छा इन बुराइयों को पालने और जारी रखने में नहीं है। निराकरण को सख्त या कम सख्त होना चाहिए एक ऐसा विषय है जिस पर विरोधी पक्ष के नेतागण निश्चय रूप से मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर से बातचीत कर सकते हैं और बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। मैं जो सुझाव देता हूँ वह यह है कि इस सदन को प्रगति की ओर कुछ कदम बढ़ाने चाहिए और आने वाली पीढि़यों को यह विश्वास करने दीजिए कि इस सदन में वास्तविक या बनावटी विरोध के बावजूद भी हिन्दू समाज में सुधार करने की दिशा में कम से कम एक कदम बढ़ाने का भी साहस था। यह आपका व्यक्तिगत और सामाजिक दृष्टि से महान योगदान होगा और मुझे आशा है कि पूरा सदन इस अवसर के लिए तत्पर होगा। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि जो भी सुझाया गया है उसे आपको स्वीकार कर लेना चाहिए और न ही आपको हर चीज को अस्वीकार कर देना चाहिए। हमें अपना दिमाग खुला रखना चाहिए। हमें इस पर सहमत होना चाहिए कि समाज में बुराई है और हमें इस पर भी सहमत होना चाहिए कि कोई निराकरण अवश्य ढूँढा जाना चाहिए। मुझे केवल इतना ही कहना है और मैं आशा करता हूँ कि सदन मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर द्वारा रखे गए हिंदू संहिता का उसी भावना से समर्थन करेगा।

माननीय उपाध्यक्ष : इससे पहले कि मैं पंडित कुंजरू को बोलने के लिए पुकारूँ

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मैं कहना चाहता हूँ कि मानों मैं प्रथम पाठन पर भाषण सुनता रहा हूँ न कि सदन के सम्मुख प्रस्तुत खंड 2 पर। खंड 2 में चार उपखंड हैं और उनसे संबंधित संशोधन हैं। कई सदस्यों ने ठीक उसी खंड को संबोधित नहीं किया है।