हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 292

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तरह के महत्वपूर्ण कार्य पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है। यदि विधेयक को कभी-कभार या हल्के ढंग से लिया जाता है और जब किसी स्तर पर विधेयक का विरोध होता है तो इसे टाल दिया जाता है। फिर इसके लिए शक्ति जुटाई जाती है और इसे पुनः प्रस्तुत किया जाता है। यह हमारी गलती नहीं है। यदि इसे विशेष सत्र के दौरान लाया गया होता तो सदन इस पर पूरा ध्यान देता और तब हम ये अच्छे ढंग से जान पाते कि हमने अमुक दिन क्या कहा और अब हमारा इस पर क्या प्रतिवाद है। अब यह हमारे सामने पहले वाला विधेयक नहीं है जो विधेयक प्रस्तुत किया गया है वो पूरी तरह नया है।

सरदार बी. एस. मान (पंजाब) : महोदय, जैसा कि आपने समापन प्रस्ताव का उल्लेख किया है और इसको लाये जाने की संभावना है, मैं आप से अनुरोध करना चाहता हूँ कि उन सदस्यों को जिन्होंने संप्रदाय विशेष से संबंधित संशोधन पेश किये हैं, को भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने का अवसर दिया जाये। मैं आशा करता हूँ कि आप द्वारा समापन प्रस्ताव को तब तक स्वीकार नहीं किया जायेगा जब तक हमें अर्थात् जिन्होंने संशोधन पेश किया है, को बोलने का अवसर नहीं दिया जाता।

माननीय उपाध्यक्ष : मेरी मुश्किल यह थी कि मैं उन लोगों को ढूँढता रहा जिन्होंने संशोधन पेश किये थे। अन्य व्यक्ति जो अपने पेश किये गये संशोधनों पर बोल चुके थे, उन्हें मैंने आमंत्रित नहीं किया। मैंने उन चार माननीय सदस्यों को बोलने हेतु आमंत्रित किया जिन्होंने संशोधन पेश किये थे और जो अभी तक उन संशोधनों पर बोले नहीं थे। मैं सदन की ओर देख रहा था कि वे उठें और बोलें। कल का पूरा दिन व्यतीत हो गया और उनमें से कोई भी बोलने के लिए नहीं उठा। इसलिए, अब वे यह नहीं कह सकते कि जब तक उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित नहीं किया जाता कोई समापन प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जायेगा। यदि वे उठकर बोलना ही न चाहे तो आज सरदार बी. एस. मान ने यह लिखकर मेरे पास एक पर्ची भेजी थी कि वे बोलने को तैयार थे, लेकिन कल वो अपनी ओर मेरा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाये....

सरदार बी. एस. मान : मैं कल भी बोलने के लिए खड़ा हुआ था।

माननीय उपाध्यक्ष : विधेयक के सामान्य सिद्धान्तों पर चर्चा विचार प्रक्रम के समय पहले ही चर्चा हो चुकी है। जहां तक इस खंड का संबंध इसे तुरन्त लागू किया जाये या इसे ऐच्छिक रखा जाये, ये ऐसे मामले हैं जिन पर संशोधन पेश किये गये हैं। लेकिन अब सम्पूर्ण विधेयक पर चर्चा करना और यह कि इसे स्वीकार किया जाये या नहीं, मेरी समझ से संगत नहीं जान पड़ते।

श्री जे. आर. कपूर (उत्तर प्रदेश) : जहां तक मेरा संबंध है कल मैं आपका ध्यान आकर्षित करने हेतु इसलिए खड़ा नहीं हुआ क्योंकि मैं आपके उस निर्देश या विचार