278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से सहमत नहीं था जिसमें आपने कहा था आप संशोधन पेश करने वाले को उन सदस्यों के बाद बोलने का अवसर देंगे जो पूर्व में इस विषय पर नहीं बोले हैं। मेरे बोलने का यही कारण था....
माननीय उपाध्यक्ष : यदि वह बोलने के लिए खड़ा भी होते तो मैं उन्हें बोलने की अनुमति नहीं देता।
श्री जे. आर. कपूर : मेरे द्वारा पेश किये गये संशोधनों के मद्दे नजर भी आप बोलने की अनुमति नहीं देते?
माननीय उपाध्यक्ष : अब मैंने सभी संशोधनों को सारणीबद्ध कर दिया है और उन्हें परिचालित कर दिया गया है। माननीय सदस्य ने कोई नया संशोधन नहीं दिया है। उनके द्वारा प्रस्तुत पूर्व संशोधनों की अनुकृतियां मात्र हैं। दूसरे सदस्यों को बोलने का मौका देने के पश्चात् मैं उन सदस्यों के नामों पर विचार करूंगा जो इस मामले पर बोल चुके हैं। लेकिन इस समय मैं ऐसे किसी सदस्य को बोलने की अनुमति नहीं दूँगा जो पहले बोल चुके हैं। कल जब मैं पीठासीन नहीं था तब किसी तरह डॉ. देशमुख को आमंत्रित कर दिया गया होगा। यदि मैं पीठासीन होता तो मैं उन्हें बिल्कुल नहीं बुलाता।
श्री जे. आर. कपूर : मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गये संशोधन दो तरह के हैं- एक पुराना है और दूसरा पूरी तरह से नया है।
माननीय उपाध्यक्ष : दूसरे सदस्यों को बोलने का मौका देने के पश्चात् मैं आपकी बात भी सुनूंगा।
श्री भट्ट : माननीय उपाध्यक्ष जी, माफ कीजिये, मैं आपके सामने बैठा हूँ मगर आपकी दृष्टि मेरी तरफ नहीं जा रही है। मैं कल से खड़ा हो रहा हूँ। आपने फ़रमाया कि जिन्होंने संशोधन पेश किये हैं उनमें से कोई खड़ा नहीं हुआ है। शायद इसमें आपको थोड़ा सा स्मृति दोष हो रहा है।
माननीय उपाध्यक्ष : शान्ति, शान्ति, माननीय सदस्य को यह दोष नहीं लगना चाहिए कि मैंने उन्हें देखा नहीं। माननीय सदस्यों को इतना धैर्य नहीं कि वे बैठें और अपनी बारी की प्रतीक्षा करें। वे जब भी आते हैं, यह आशा करते हैं कि फौरन उनका नाम पुकार दिया जाये और यदि ऐसा नहीं होता है तो वे लॉबी में चले जाते हैं। मैं हर बात को अपने मस्तिष्क में नहीं रख सकता। जब मैं अगले सदस्य का नाम पुकारता हूँ और वह अपने स्थान पर उपलब्ध नहीं है तो मैं भी उसे नज़रअंदाज कर देता हूँ मेरे मस्तिष्क में उनका कोई क्रम तो बना नहीं है कि एक के बाद दूसरे को बुलाऊं।