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लोकसभा में भी ऐसी प्रथा नहीं है। जब मैं अध्यक्ष पद पर आसीन था मैंने किसी सदस्य को खड़े नहीं देखा। मेरे पास उन सदस्यों की एक सूची है जो अभी तक नहीं बोले हैं किन्तु जिन्होंने संशोधन प्रस्तुत किये हैं। परन्तु उन्हें यहां बैठने का धैर्य नहीं है और यदि उनका नाम नहीं पुकारा जाता है तो वे सीधे सभाकक्ष में चले जाते हैं।
पंडित मैत्रा : उपाध्यक्ष महोदय, आपने जो किया हम उससे किसी तरह असन्तुष्ट नहीं हैं। मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि हम सब यहीं सोचते हैं कि आप हमारे साथ पक्षपात रहित-निष्पक्ष बर्ताव कर रहे है। हमें पीठासीन अधिकारी से कोई शिकायत नहीं है।
पंडित कृष्ण चन्द्र शर्मा (उत्तर प्रदेश) : मेरा सुझाव है कि श्री भट्ट को अपने
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शब्द वापस ले लेने चाहिए।
पंडित मैत्रा : उन्होंने कोई आपत्तिजनक बात नहीं कही।
श्री भट्ट : महोदय, आपकी आज्ञा हो तो मैं स्थिति स्पष्ट करना चाहूँगा। जो बात मैं आपके ध्यान में लाना चाहता था वह यह थी कि मैं खड़ा हुआ था लेकिन शायद आप देख नहीं सके।
माननीय उपाध्यक्ष : अब मैं उन सदस्यों के नाम पुकारता हूँ जिन्होंने संशोधन पेश किये हैं लेकिन जो अभी तक बोले नहीं हैं।
* पंडित कुंजरू (उत्तर प्रदेश) : मैं आपकी बात से सहमत हूँ। महोदय, हम भी यही चाहते थे कि चर्चा उस धारा विशेष पर हो।
कल की चर्चा के दौरान सिद्धांत के महत्वपूर्ण प्रश्न उठाये गये थे और मैं देखता हूँ कि माननीय सदस्यों के हृदय अभी कल की चर्चा से ही रंगे हुए हैं। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि इन प्रश्नों पर कुछ कहा जाये जिससे कि विधेयक के उन भागों जिनकी हम चर्चा करने जा रहे हैं, के विरुद्ध उत्पन्न पूर्वाग्रहों को दूर किया जा सके। कल जिन प्रश्नों को उठाया गया था, मेरे मित्र श्री एन. वी. गाडगिल ने उनमें से कुछ का बड़ा सटीक उत्तर दिया है आज मैं इस विषय पर और अधिक इसलिये बोलना चाहता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि कल जो इस बारे में कहा गया उसमें न केवल हिंदू कानून की मूलभूत बातों को नज़रअन्दाज किया गया अपितु उसमें हिंदू समाज में हो रहे परिवर्तनों की अनदेखी भी की गई। प्रस्तुत विधेयक पर विचार करने के लिये इतना ही काफी नहीं है कि हम इसके उपबन्धों तक ही ध्यान सीमित रखें, अपितु यह भी आवश्यक है कि हम उस समाज के चरित्र को
* संसदीय वाद-विवाद खंड XV, भाग II, 18 सितंबर, 1951 पृष्ठ 2772